मध्य प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था एक बार फिर कठघरे में है। सरकारी स्कूलों की जर्जर इमारतें, टूटी खिड़कियां, बिना पुताई की दीवारें, बंद पड़े शौचालय, न बिजली, न पंखे—लेकिन कागजों में सब दुरुस्त। हाल ही में मैहर के रामनगर का मामला सामने आने के बाद विधानसभा से लेकर सड़कों तक हंगामा मच गया। आरोप है कि स्कूलों की मरम्मत और आधारभूत सुविधाओं के नाम पर करोड़ों रुपये निकाल लिए गए, जबकि जमीनी हकीकत में एक ईंट तक नहीं हिली।
यह कोई एक जिले की कहानी नहीं है। सिंगरौली, शहडोल, सतना, शिवपुरी, अशोक नगर, अनूपपुर, बुंदेलखंड के कई जिलों, बैतूल और नरसिंहपुर सहित तीन दर्जन से अधिक जिलों से लगातार शिकायतें आ रही हैं। सवाल यह है कि जब शिकायतें इतनी व्यापक हैं, तो क्या यह महज लापरवाही है या संगठित भ्रष्टाचार का जाल?
सरकारी फाइलों में स्कूलों की मरम्मत पूरी दिखा दी जाती है। दीवारों की पुताई, छत की मरम्मत, शौचालय निर्माण, पानी की टंकी, बिजली फिटिंग—हर मद में लाखों-करोड़ों का खर्च दर्ज है। लेकिन जब स्थानीय लोग और जनप्रतिनिधि स्कूलों का निरीक्षण करते हैं तो सच्चाई सामने आ जाती है। कई जगहों पर बच्चों को बिना पंखे के तपती गर्मी में बैठना पड़ता है। बरसात में छत टपकती है। शौचालय या तो अधूरे हैं या उपयोग लायक नहीं। यह विडंबना ही है कि शिक्षा के अधिकार और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के दावों के बीच बच्चों को मूलभूत सुविधाएं भी नसीब नहीं हो रहीं। आखिर पैसा गया कहां?
जब सत्ता पक्ष के ही एक विधायक ने शिक्षा विभाग के अधिकारियों पर करोड़ों की निकासी का आरोप लगाया तो सदन में भूचाल आ गया। विपक्ष ने इसे मुद्दा बनाकर सरकार को घेर लिया। आरोप साफ है—बिना मरम्मत कार्य कराए भुगतान निकाल लिया गया। यदि यह सच है तो यह केवल वित्तीय अनियमितता नहीं, बल्कि बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ है। शिक्षा विभाग के तमाम प्रयास, योजनाएं और घोषणाएं तब खोखली लगने लगती हैं जब जमीनी स्तर पर स्कूलों की हालत बदतर बनी रहती है।
इतने व्यापक स्तर पर यदि अनियमितताएं हो रही हैं तो यह मान लेना कठिन है कि यह सब बिना किसी ऊपरी संरक्षण के संभव है। एक-दो स्कूलों में गड़बड़ी अलग बात हो सकती है, लेकिन जब दर्जनों जिलों में एक जैसा पैटर्न दिखाई दे—पहले बजट स्वीकृत, फिर भुगतान और अंत में काम अधूरा—तो यह एक संगठित तंत्र की ओर इशारा करता है। प्रश्न उठता है—क्या कार्य पूर्ण होने का भौतिक सत्यापन हुआ? क्या भुगतान से पहले स्वतंत्र एजेंसी से जांच कराई गई? क्या जिम्मेदार अधिकारियों पर कोई कार्रवाई हुई? यदि इन सवालों के जवाब नहीं हैं, तो फिर यह मानना पड़ेगा कि भ्रष्टाचार की जड़ें गहरी हैं।
सरकारें बदलती रहीं, योजनाएं बनती रहीं, बजट बढ़ता रहा—फिर भी सरकारी स्कूलों का स्तर अपेक्षित सुधार क्यों नहीं कर पा रहा? इसका एक बड़ा कारण यही है कि आवंटित राशि का पूरा लाभ बच्चों तक नहीं पहुंचता। जब स्कूल भवन ही जर्जर होंगे, शिक्षण सामग्री समय पर नहीं पहुंचेगी, बिजली-पानी जैसी बुनियादी सुविधाएं नहीं होंगी, तो गुणवत्ता की बात करना बेमानी है। शिक्षक भी ऐसे वातावरण में प्रेरित नहीं रह पाते। परिणामस्वरूप अभिभावक निजी स्कूलों की ओर रुख करते हैं और सरकारी स्कूलों में नामांकन घटता जाता है।
अब केवल आरोप-प्रत्यारोप से काम नहीं चलेगा। आवश्यकता है ठोस कार्रवाई की। उच्च स्तरीय जांच समिति गठित हो, जिसमें तकनीकी विशेषज्ञ शामिल हों। जिलावार ऑडिट कराया जाए और रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए। जिन अधिकारियों और ठेकेदारों की भूमिका संदिग्ध हो, उनके खिलाफ एफआईआर और विभागीय कार्रवाई हो। भविष्य में भुगतान से पहले जियो-टैगिंग और ऑनलाइन मॉनिटरिंग अनिवार्य की जाए। स्थानीय समुदाय और स्कूल प्रबंधन समितियों को निगरानी का अधिकार दिया जाए।
भ्रष्टाचार केवल ऊपर से नहीं पनपता, वह तब फलता-फूलता है जब समाज चुप रहता है। यदि अभिभावक, शिक्षक और स्थानीय जनप्रतिनिधि समय रहते आवाज उठाएं, तो ऐसे मामलों को रोका जा सकता है। सूचना का अधिकार, सोशल मीडिया और जनसुनवाई जैसे माध्यमों का प्रभावी उपयोग जरूरी है। यह मामला किसी एक जिले, एक अधिकारी या एक सरकार का नहीं है। यह उस व्यवस्था का आईना है जिसमें योजनाएं तो बनती हैं, लेकिन क्रियान्वयन में पारदर्शिता नहीं होती।
यदि शिक्षा विभाग में व्याप्त इस कथित भ्रष्टाचार पर कठोर कार्रवाई नहीं हुई, तो संदेश साफ जाएगा कि बच्चों के अधिकारों से बड़ा कोई स्वार्थ है। अब समय है कि सरकार शून्य सहनशीलता की नीति अपनाए। दोषियों को संरक्षण देने के बजाय उदाहरण प्रस्तुत करे, क्योंकि सवाल केवल पैसों का नहीं है—सवाल उन लाखों बच्चों के भविष्य का है जो सरकारी स्कूलों में पढ़ते हैं और बेहतर कल का सपना देखते हैं। यदि स्कूलों की दीवारों पर चढ़ने वाला रंग ही कागजों में गायब हो जाए, तो समझ लीजिए व्यवस्था की नींव कमजोर हो चुकी है। उस नींव को मजबूत करना ही अब सबसे बड़ी प्राथमिकता होनी चाहिए।


