मार्च के मध्य में आने वाली यह विशेष एकादशी पापमोचनी एकादशी कहलाती है, जो १५ मार्च २०२६, रविवार को मनाई जाएगी और इसे भगवान विष्णु को समर्पित सबसे महत्वपूर्ण व्रतों में से एक माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यह वह दिन माना जाता है जब व्यक्ति अपने जीवन की नकारात्मकताओं, पुराने कर्मों और मानसिक बोझ से मुक्ति पाने के लिए उपवास और भक्ति का सहारा लेता है। इस वर्ष एकादशी तिथि १४ मार्च की सुबह से प्रारम्भ होकर १५ मार्च की सुबह तक प्रभावी रहती है, इसलिए अधिकांश स्थानों पर व्रत १५ मार्च को रखा जाएगा।
पंचांग के अनुसार यह तिथि चंद्रमा के कृष्ण पक्ष की ग्यारहवीं अवस्था में आती है, जब चन्द्रमा धीरे-धीरे अमावस्या की ओर बढ़ रहा होता है। ज्योतिषीय मान्यता में यह समय आत्मनियंत्रण, संयम और मन की शुद्धि के लिए उपयुक्त माना जाता है। इस दिन व्रत रखने वाले लोग प्रातः स्नान करके भगवान विष्णु की पूजा करते हैं, तुलसी पत्र अर्पित करते हैं और विष्णु मंत्रों का जाप करते हैं। व्रत का मुख्य नियम यह माना जाता है कि पूरे दिन अनाज और तामसिक भोजन का त्याग किया जाए। सामान्यतः लोग फलाहार लेते हैं, जैसे फल, दूध, दही, मखाने, साबूदाना या सिंघाड़े के आटे से बने हल्के व्यंजन। इसके विपरीत चावल, गेहूं, दालें, लहसुन-प्याज और भारी भोजन से दूर रहने की परंपरा है, क्योंकि इसे शरीर और मन दोनों को हल्का रखने का उपाय माना जाता है।
आध्यात्मिक परंपरा में यह भी कहा जाता है कि इस दिन उपवास केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं बल्कि शरीर के लिए एक प्रकार का विश्राम भी होता है। हल्का भोजन और संयम रखने से पाचन तंत्र को आराम मिलता है और कई लोग इसे मानसिक स्पष्टता और अनुशासन से भी जोड़ते हैं। हालांकि आधुनिक चिकित्सा इसे धार्मिक कारणों से नहीं बल्कि संतुलित उपवास और हल्के भोजन के रूप में देखती है। परंपरा के अनुसार यह व्रत अगले दिन द्वादशी तिथि में “पारण” के साथ पूरा किया जाता है, जो सामान्यतः १६ मार्च की सुबह लगभग साढ़े छह बजे से आठ बजे के बीच किया जाता है, जब व्रती हल्का सात्विक भोजन लेकर व्रत समाप्त करते हैं।
ज्योतिषीय दृष्टि से कई विद्वान मानते हैं कि चन्द्रमा के इस चरण का प्रभाव मन और भावनाओं से जुड़ा होता है, इसलिए यह समय आत्मनिरीक्षण और सकारात्मक संकल्प लेने के लिए उपयुक्त माना जाता है। विशेष रूप से वे लोग जो आध्यात्मिक अभ्यास, ध्यान या भक्ति से जुड़े हैं, इस दिन को अपने भीतर की नकारात्मकता को छोड़ने और नई ऊर्जा प्राप्त करने का अवसर मानते हैं। इसी कारण इसे केवल कैलेंडर की एक तिथि नहीं बल्कि आत्मसंयम, श्रद्धा और आंतरिक संतुलन का प्रतीक माना जाता है, जिसे हर वर्ष लाखों लोग श्रद्धा और विश्वास के साथ मनाते हैं।


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