मध्य-पूर्व
08 Jan, 2026

कागज़ों में दौड़ती एंबुलेंस, सड़कों पर उठती अर्थियाँ

कागज़ों में दौड़ती एंबुलेंस, सड़कों पर उठती अर्थियाँ

कागज़ों में दौड़ती एंबुलेंस, सड़कों पर उठती अर्थियाँ
देश और प्रदेश में स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर सरकारी दावे जितने बड़े हैं, ज़मीनी हकीकत उतनी ही असहज और विचलित करने वाली है। हर मंच से यह कहा जाता है कि अब किसी भी मरीज को इलाज के लिए भटकना नहीं पड़ेगा। 108, 112, 100 जैसे आपातकालीन नंबरों पर कॉल करते ही एंबुलेंस मिनटों में उपलब्ध होगी। गरीब, दलित, आदिवासी—सबके लिए समान सुविधा, समान अधिकार। लेकिन बार-बार सामने आ रही घटनाएँ इन दावों पर गंभीर सवाल खड़े कर रही हैं।
जब एंबुलेंस नहीं पहुँचती, तो इंसान खुद साधन बन जाता है। हाल के वर्षों में प्रदेश के कई जिलों से ऐसे दृश्य सामने आए हैं, जिन्होंने समाज की संवेदनशीलता को झकझोर दिया है। कहीं ठेले पर मरीज को अस्पताल ले जाया गया, कहीं खटिया पर, कहीं साइकिल पर शव बाँधकर पिता चलता दिखा, तो कहीं मोटरसाइकिल पर माँ अपनी बच्ची की लाश को सीने से लगाए 80–100 किलोमीटर का सफर तय करती नज़र आई। ये दृश्य किसी एक जिले या एक दिन की कहानी नहीं हैं। गुना, विदिशा, सीधी, मंडला, टीकमगढ़, अनूपपुर, डिंडोरी जैसे जिलों से समय-समय पर ऐसी खबरें सामने आती रही हैं। सवाल यह है कि जब एंबुलेंस, कर्मचारी और योजनाएँ मौजूद हैं, तो ज़रूरत के वक्त वे नदारद क्यों हो जाती हैं?
स्वास्थ्य विभाग के आँकड़ों पर नज़र डालें तो प्रदेश में सैकड़ों एंबुलेंस संचालित हैं। इनके संचालन पर हर साल करोड़ों रुपये खर्च किए जाते हैं। कॉल सेंटर, ड्राइवर, पैरामेडिकल स्टाफ, ईंधन और मेंटेनेंस—सब कुछ बजट में शामिल है। इसके अलावा इन योजनाओं के प्रचार-प्रसार पर भी बड़ी राशि खर्च होती है। फिर भी जब किसी गाँव में दुर्घटना होती है, प्रसव पीड़ा में महिला होती है या गंभीर मरीज को तत्काल अस्पताल ले जाना होता है, तो परिजन हाथ जोड़कर वाहन खोजते नज़र आते हैं। कई बार कॉल करने के बाद भी जवाब मिलता है—“गाड़ी उपलब्ध नहीं है” या “दूसरे केस में गई है।”
कुछ समय पहले एक ऐसी घटना सामने आई, जिसमें इलाज के लिए ले जाते समय नवजात बच्ची माँ की गोद से गिर गई और उसकी मौत हो गई। पीड़ित परिवार को न एंबुलेंस मिली, न बाद में शव वाहन। यह सिर्फ एक दुर्घटना नहीं थी, बल्कि व्यवस्था की असफलता का जीवंत उदाहरण थी। इस मामले में संबंधित जिले के प्रशासनिक और स्वास्थ्य अधिकारियों की भूमिका पर सवाल उठे। जाँच के आदेश दिए गए, स्पष्टीकरण माँगा गया, लेकिन ऐसे मामलों में अक्सर कार्रवाई कागज़ों तक ही सीमित रह जाती है।
हर घटना के बाद एक ही प्रक्रिया दोहराई जाती है—जाँच होगी, दोषी पाए जाने पर कार्रवाई होगी, भविष्य में सुधार किया जाएगा। लेकिन सवाल यह है कि अब तक कितनी ठोस कार्रवाई हुई है? कितने अधिकारी या कर्मचारी वास्तव में जिम्मेदार ठहराए गए हैं? जब किसी जिले में एंबुलेंस समय पर नहीं पहुँचती, तो क्या सिर्फ ड्राइवर दोषी होता है, या फिर पूरी निगरानी व्यवस्था, कंट्रोल रूम और जिला प्रशासन की भी जवाबदेही बनती है?
यह भी संयोग नहीं है कि ऐसी घटनाएँ अधिकतर ग्रामीण, दूरस्थ और आदिवासी इलाकों से सामने आती हैं, जहाँ सड़कें सीमित हैं, आवाज़ कमजोर है और संसाधनों तक पहुँच कठिन। शहरों में रहने वाले नागरिकों को अपेक्षाकृत जल्दी सुविधा मिल जाती है, जबकि गाँवों में रहने वाले लोग आज भी परिवहन के लिए निजी साधनों या दूसरों की मदद पर निर्भर हैं। यह असमानता योजनाओं की आत्मा के खिलाफ है।
सरकारें एयर एंबुलेंस जैसी सुविधाओं को उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत करती हैं। निस्संदेह यह एक सराहनीय पहल है, लेकिन सवाल यह है कि जब ज़मीनी एंबुलेंस ही समय पर उपलब्ध नहीं हो पा रही, तब हवाई दावों का क्या अर्थ रह जाता है? गाँव का एक गरीब परिवार एयर एंबुलेंस की कल्पना भी नहीं कर सकता। उसकी ज़रूरत तो बस इतनी है कि प्रसव पीड़ा में तड़पती महिला या घायल मरीज को समय पर अस्पताल पहुँचाया जा सके।
सरकारी योजनाओं का प्रचार आवश्यक है, लेकिन उससे अधिक आवश्यक है उनका प्रभावी क्रियान्वयन। यदि योजनाएँ केवल आँकड़ों और विज्ञापनों तक सीमित रह जाएँ और ज़रूरतमंद तक न पहुँचें, तो उनका औचित्य समाप्त हो जाता है। एक माँ की गोद में मरा बच्चा, एक पिता के कंधे पर शव—ये दृश्य किसी भी विकास मॉडल पर सबसे बड़ा प्रश्नचिह्न हैं।
अब समय आ गया है कि इस विषय पर गंभीरता से आत्ममंथन किया जाए। एंबुलेंस सेवाओं की रियल-टाइम निगरानी हो, कॉल सेंटर की जवाबदेही तय हो, ग्रामीण क्षेत्रों में अतिरिक्त वाहन और स्टाफ की व्यवस्था हो और लापरवाही पर त्वरित व सार्वजनिक कार्रवाई की जाए। सिर्फ आदेश और निर्देश जारी करने से व्यवस्था नहीं सुधरती, बल्कि निरंतर निगरानी और इच्छाशक्ति से ही बदलाव आता है।
स्वास्थ्य सेवा किसी भी समाज की संवेदनशीलता का पैमाना होती है। जब वही सेवा सबसे कमजोर व्यक्ति के लिए असफल हो जाती है, तो यह सिर्फ प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना पर भी सवाल है। अगर एंबुलेंस कागज़ों में दौड़ें और ज़मीन पर लोग अपने प्रियजनों को कंधों पर ढोते नज़र आएँ, तो यह स्वीकार्य नहीं हो सकता। अब ज़रूरत है कि योजनाओं और दावों के बीच की इस खाई को ईमानदारी से पाटा जाए, ताकि किसी और माँ की गोद और किसी और पिता के कंधे पर व्यवस्था की नाकामी का बोझ न पड़े।

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