24 फरवरी 1983 का दिन भारत के इतिहास में एक दर्दनाक और भयावह घटना के रूप में दर्ज है, जब असम के नेल्ली और आसपास के गांवों में भड़की हिंसा में आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार लगभग 1800 से अधिक लोगों की जान चली गई, जबकि स्वतंत्र आकलनों में मृतकों की संख्या 3000 से अधिक बताई जाती है। यह घटना उस दौर की सबसे भीषण सामूहिक हिंसा मानी जाती है।
यह नरसंहार 1983 के असम विधानसभा चुनावों की पृष्ठभूमि में हुआ, जब राज्य में बाहरी घुसपैठ का मुद्दा काफी गर्म था। असम के कई संगठनों और मूल निवासियों का आरोप था कि बंगाल और बांग्लादेश से आए अवैध प्रवासियों की बढ़ती संख्या से उनकी जमीन, संसाधनों और राजनीतिक अधिकारों पर असर पड़ रहा है। इसी मुद्दे को लेकर 1979 से राज्य में व्यापक आंदोलन चल रहा था, जिसका नेतृत्व ऑल असम स्टूडेंट यूनियन सहित कई संगठनों ने किया था।
केंद्र सरकार द्वारा चुनाव कराने के निर्णय का विरोध किया गया, क्योंकि आंदोलनकारी मतदाता सूची से कथित अवैध प्रवासियों के नाम हटाने की मांग कर रहे थे। चुनाव के दौरान कई क्षेत्रों में तनाव और बहिष्कार की स्थिति बनी रही। इसी तनावपूर्ण माहौल में 24 फरवरी को नेल्ली और आसपास के गांवों में भीड़ ने हमला कर दिया।
रिपोर्टों के अनुसार कुछ ही घंटों में सैकड़ों परिवार तबाह हो गए। मरने वालों में महिलाओं और बच्चों की संख्या अधिक थी। इस घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया और असम में कानून व्यवस्था तथा सामाजिक ताने-बाने पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए। बाद में मामले की जांच के लिए तिवारी आयोग गठित किया गया, लेकिन उसकी रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं की गई। 1985 में असम समझौते के जरिए आंदोलन समाप्त हुआ, जिसमें 24 मार्च 1971 को नागरिकता निर्धारण की कट-ऑफ तारीख तय की गई।
नेल्ली हत्याकांड आज भी असम और देश के इतिहास में एक दर्दनाक अध्याय के रूप में याद किया जाता है, जिसने सामाजिक और राजनीतिक असंतोष के कारण उत्पन्न होने वाली हिंसा की भयावहता को उजागर किया।



