आवास खाली कराने का न्याय-क्षेत्र सिविल न्यायालय है।
आजकल माता-पिता एवं वरिष्ठ नागरिकों को इस गंभीर समस्या से जूझना पड़ रहा है कि उनके बच्चे उनकी संपत्ति अपने नाम करा लेने के बाद अथवा स्वयं की अर्जित संपत्ति पर कब्जा कर लेते हैं, माता-पिता को बेदखल कर देते हैं, वृद्धावस्था में उनकी देखभाल नहीं करते और उनका भरण-पोषण नहीं करते। इस संबंध में बॉम्बे उच्च न्यायालय और कलकत्ता उच्च न्यायालय ने महत्वपूर्ण निर्णय दिए हैं, जिनमें माता-पिता एवं वरिष्ठ नागरिकों के भरण-पोषण तथा कल्याण अधिनियम 2007 की व्याख्या की गई है। वरिष्ठ नागरिकों को इसकी जानकारी होना चाहिए कि उनके क्या अधिकार हैं।
बॉम्बे उच्च न्यायालय का निर्णय
बॉम्बे उच्च न्यायालय की एकल पीठ, न्यायमूर्ति सोमशेखर सुन्दरेशन ने पीकेजी बनाम केजीजी की याचिका में महत्वपूर्ण निर्णय दिया है। निर्णय में कहा गया है कि वरिष्ठ नागरिक और उनके बच्चों के बीच हर विवाद पर भरण-पोषण अधिनियम 2007 लागू नहीं होता। उच्च न्यायालय ने न्यायाधिकरण के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें दो बेटों को अपने पिता की संपत्ति खाली करने का निर्देश दिया गया था।
न्यायमूर्ति एस. सुन्दरेशन ने कहा कि माता-पिता एवं वरिष्ठ नागरिकों के भरण-पोषण एवं कल्याण अधिनियम 2007 के तहत माता-पिता एवं वरिष्ठ नागरिकों को भरण-पोषण न्यायाधिकरण का दरवाज़ा तभी खटखटाने का अधिकार है, जब वे अपनी आय या अपनी संपत्ति से अपना गुज़ारा करने में असमर्थ हों। इस मामले में पिता को पेंशन के रूप में प्रति माह 40,000 रुपये प्राप्त हो रहे थे और वे अपनी दूसरी पत्नी के साथ अलग रह रहे थे। इसलिए उच्च न्यायालय ने माना कि उन्हें भरण-पोषण का निर्देश देना आवश्यक नहीं था।
उच्च न्यायालय ने पिता को नया आवेदन देने का निर्देश दिया, किंतु इस शर्त पर कि उन्हें अपनी असमर्थता सिद्ध करने के लिए समुचित साक्ष्य प्रस्तुत करने होंगे।
निर्णय का सार यह है कि वरिष्ठ नागरिकों के संरक्षण एवं कल्याण अधिनियम 2007 के प्रावधानों का लाभ तभी मिलेगा, जब माता-पिता या वरिष्ठ नागरिक भरण-पोषण प्राप्त करने के लिए असमर्थता और अक्षमता सिद्ध करें। संपत्ति के आपसी विवाद से संबंधित बेदखली का क्षेत्राधिकार माता-पिता एवं वरिष्ठ नागरिकों के भरण-पोषण एवं कल्याण अधिनियम 2007 के अंतर्गत नहीं है।
कलकत्ता उच्च न्यायालय का निर्णय
कलकत्ता उच्च न्यायालय की एकल पीठ, न्यायमूर्ति कृष्णराव ने पुष्प शर्मा बनाम स्टेट ऑफ बंगाल में निर्णय दिया है कि माता-पिता एवं वरिष्ठ नागरिकों के भरण-पोषण तथा कल्याण अधिनियम 2007 के अंतर्गत भरण-पोषण न्यायाधिकरण को आवास खाली कराने का अधिकार नहीं है। यह अधिकार सिविल न्यायालय को है।
याचिका के तथ्यों के अनुसार पुष्पा शर्मा के पति की मृत्यु हो गई थी। उनके दो पुत्र थे, जिन्होंने तीन मंज़िला आवास पर कब्जा कर लिया और मां को बेदखल कर दिया तथा उन्हें भरण-पोषण राशि भी नहीं दी जा रही थी।
मां पुष्पा शर्मा ने माता-पिता एवं वरिष्ठ नागरिकों के भरण-पोषण एवं कल्याण अधिनियम 2007 के अंतर्गत भरण-पोषण न्यायाधिकरण में आवेदन दायर किया।
भरण-पोषण न्यायाधिकरण ने 30 हजार रुपये मासिक भरण-पोषण राशि तथा मां की बीमारी के चिकित्सा उपचार का खर्च देने के आदेश दिए एवं तीन माह के भीतर पुत्रों को आवास खाली करने के निर्देश भी दिए।
दो पुत्रों में से एक ने उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर भरण-पोषण न्यायाधिकरण के निर्णय को चुनौती दी और आवास खाली करने के आदेश को क्षेत्राधिकार के बाहर बताया।
उच्च न्यायालय ने अपने निर्णय में कहा कि भरण-पोषण न्यायाधिकरण को माता-पिता एवं वरिष्ठ नागरिकों के भरण-पोषण एवं कल्याण अधिनियम 2007 के अंतर्गत केवल भरण-पोषण राशि निर्धारित करने का अधिकार है। आवास खाली कराने का अधिकार न्यायाधिकरण को नहीं है, उसका उपचार सिविल न्यायालय में है। उच्च न्यायालय ने 30 हजार रुपये मासिक भरण-पोषण तथा चिकित्सा खर्च संबंधी आदेश को यथावत रखा, किंतु तीन माह में आवास रिक्त करने के निर्देश को निरस्त कर दिया।


