मध्य प्रदेश में विकास के दावों की चकाचौंध के बीच एक कड़वी हकीकत बार-बार सिर उठा रही है। नई सड़कें बैठ रही हैं, चमचमाते पुलों में दरारें पड़ रही हैं और करोड़ों की परियोजनाएँ पहली ही बारिश में घुटने टेक दे रही हैं। यह कोई एक-दो घटनाओं का सिलसिला नहीं, बल्कि व्यवस्था के भीतर जड़ जमा चुकी लापरवाही और संभावित भ्रष्टाचार की खुली तस्वीर है।
कटघरे में है मध्य प्रदेश लोक निर्माण विभाग। प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों—भोपाल, जबलपुर, ग्वालियर और इंदौर—से लगातार ऐसी खबरें सामने आ रही हैं, जो विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करती हैं। राजधानी के पास नई सड़क का धँस जाना, मंडीदीप के नजदीक नदी किनारे बनी सड़क का बैठ जाना, टोल प्लाजा के आसपास निर्माण की खामियां—क्या यह सब महज संयोग है? या फिर यह उस सड़ांध का परिणाम है, जो ठेके, कमीशन और सांठगांठ की परतों में छिपी बैठी है? सबसे बड़ा सवाल है—जिम्मेदार कौन?
हर बार वही रटा-रटाया जवाब सामने आता है: “ठेकेदार को ब्लैकलिस्ट कर देंगे।” लेकिन क्या ब्लैकलिस्ट करना ही जवाबदेही है? क्या इससे जनता का पैसा वापस आएगा? क्या इससे उस भरोसे की मरम्मत होगी, जो हर धँसी सड़क के साथ टूटता जा रहा है? सच्चाई यह है कि किसी भी निर्माण कार्य में गुणवत्ता की अंतिम जिम्मेदारी विभागीय अधिकारियों की होती है। यदि सामग्री घटिया है, डिजाइन दोषपूर्ण है या निगरानी नाम की कोई ठोस व्यवस्था नहीं है, तो केवल ठेकेदार को बलि का बकरा बनाना साफ तौर पर लीपापोती है।
विडंबना यह है कि जिन परियोजनाओं को “लंबी उम्र” और “मजबूत निर्माण” के दावों के साथ प्रचारित किया गया, वे कुछ ही वर्षों में दम तोड़ने लगीं। कहीं 90 डिग्री का पुल उपहास का कारण बनता है, तो कहीं एप्रोच रोड धँसकर दुर्घटना को न्योता देती है। सवाल उठता है—क्या निर्माण से पहले तकनीकी जांच हुई थी? क्या गुणवत्ता परीक्षण केवल कागजों में पूरा कर लिया गया? और यदि सब कुछ नियमों के तहत हुआ, तो फिर यह लगातार विफलता क्यों?
मामला यहीं नहीं रुकता। विभाग से जुड़े कुछ अधिकारियों के आलीशान फार्महाउस, सरकारी संसाधनों के दुरुपयोग और निजी हितों के लिए सड़कों के निर्माण जैसे आरोप भी समय-समय पर सामने आते रहे हैं। यदि ये आरोप निराधार हैं, तो सरकार को सार्वजनिक रूप से स्पष्ट करना चाहिए। और यदि इनमें सच्चाई है, तो कठोर दंड क्यों नहीं? क्या “जीरो टॉलरेंस” का नारा केवल मंचों तक सीमित है?
विकास का अर्थ केवल शिलान्यास की पट्टिकाएं नहीं होता। विकास का अर्थ है मजबूत सड़कें, सुरक्षित पुल और पारदर्शी व्यवस्था। जब एक नई बनी सड़क पहली बारिश में बैठ जाती है, तो वह केवल इंजीनियरिंग की विफलता नहीं होती, बल्कि प्रशासनिक ईमानदारी की हार भी होती है। हर धँसी सड़क के साथ जनता का विश्वास भी दरकता है।
सरकार को यह समझना होगा कि अब समय प्रतीकात्मक कार्रवाई का नहीं, बल्कि उदाहरण पेश करने का है। हर बड़ी परियोजना का स्वतंत्र तकनीकी ऑडिट अनिवार्य हो। दोषी पाए जाने पर ठेकेदार ही नहीं, संबंधित अधिकारियों पर भी आपराधिक मुकदमा दर्ज हो। अवैध अर्जित संपत्ति की जांच हो और समयबद्ध कार्रवाई सुनिश्चित की जाए। केवल निलंबन या तबादला भ्रष्टाचार की दवा नहीं है।
जनता यह जानना चाहती है कि उसके टैक्स के पैसे से बने ढांचे कितने सुरक्षित हैं। वह यह भी जानना चाहती है कि जिनके हस्ताक्षर से भुगतान जारी होता है, उनकी जवाबदेही कब तय होगी। विकास के नाम पर यदि घटिया निर्माण और कागजी गुणवत्ता का खेल चलता रहा, तो यह प्रदेश के भविष्य के साथ खिलवाड़ होगा।
अब वक्त है साफ संदेश देने का—या तो व्यवस्था खुद को सुधार ले, या जनता जवाब मांगने के लिए तैयार है। क्योंकि सड़कें केवल डामर और सीमेंट से नहीं बनतीं, वे भरोसे की नींव पर टिकती हैं। और वह नींव आज बुरी तरह हिल चुकी है।


