मध्यप्रदेश शासन, संस्कृति विभाग, उस्ताद अलाउद्दीन खां संगीत एवं कला अकादमी द्वारा जिला प्रशासन इन्दौर के सहयोग से पद्मभूषण उस्ताद अमीर खाँ की स्मृति में प्रतिष्ठापूर्ण ‘राग अमीर’ संगीत समारोह का शुभारम्भ जाल सभागृह, इन्दौर में बुधवार की शाम को हुआ। सुर एवं ताल का यह सुरमयी अनुष्ठान प्रदेश एवं देश के गुणी कलाकारों के उत्कृष्ट गायन-वादन का साक्षी बना। पहले दिन गायन एवं सितार वादन की संगीत सभाएं सजीं। भारतीय कलाओं एवं संस्कृति को नई पीढ़ी तक संचारित करने एवं प्रचार-प्रसार के उद्देश्य से मध्य प्रदेश संस्कृति विभाग का यह प्रयास इन्दौर के सुधि-श्रोताओं द्वारा सराहा गया।
समारोह का शुभारम्भ दीप प्रज्वलन कर विधिवत रूप से किया गया। इस अवसर पर मुख्य अतिथि सुप्रतिष्ठित संगीतज्ञ एवं पद्मभूषण पंडित गोकुलोत्सव महाराज, विशिष्ट अतिथि इन्दौर संभागायुक्त डॉ.सुदाम खाड़े एवं गणमान्य अतिथियों में उस्ताद अलाउद्दीन खां संगीत एवं कला अकादमी के निदेशक श्री प्रकाश सिंह ठाकुर, उप निदेशक श्री शेखर कराड़कर, लता मंगेशकर शासकीय संगीत महाविद्यालय — इन्दौर के प्राचार्य श्री प्रकाश कड़ोतिया एवं उस्ताद अलाउद्दीन खां संगीत एवं कला अकादमी के पूर्व निदेशक श्री जयंत भिसे उपस्थित रहे। उपस्थित अतिथियों ने कलाकारों का स्वागत पुष्पगुच्छ भेंट कर किया।
पहली संगीत सभा इन्दौंर की ही गुणी गायिका सुश्री स्मिता मोकाशी के गायन की रही। उन्होंने अपनी प्रस्तुति के लिए सायंकाल का करुणा रस प्रधान राग पूरिया धनश्री का चयन किया। राग के सौंदर्य को उन्होंने विलंबित खयाल की बंदिश ‘‘अब तो रुतमान आये हो....’’ एक ताल में प्रस्तुत कर दर्शाया। इसके बाद स्वतचित बंदिश ‘‘उड़जा रे जा रे कगवा....’’ के साथ अपनी साधना एवं परम्पंरा को प्रस्तुत किया। अंत में उन्होंने एक ताल में तराना प्रस्तुत कर विराम दिया। उनके साथ श्री परमानन्द गंधर्व ने हारमोनियम पर एवं श्री राहुल बेने ने तबला पर सधी संगत दी।
अगली सभा सितार वादन के नाम रही। ग्वालियर के सुविख्यालत सितार वादक एवं संगीत गुरु श्री भरत नायक ने स्वर-लहरियों का जादू बिखेरा। उन्होंने अपनी प्रस्तुति के लिये राग किरवानी का चयन किया। विलंबित की बंदिश तीन ताल में एवं द्रुत बंदिश भी तीन ताल में प्रस्तुत करते हुए लयकारियों के प्रयोग के साथ श्रोताओं के अंतर्मन तक सितार की सुन्दर अनुभूतियों को पहुंचाया। अगले क्रम में श्री भरत नायक ने झाला एवं तत्पंश्चात पारंपरिक धुन के साथ प्रस्तुति को विराम दिया। श्री नायक के वादन में मन, भाव एवं तकनीक का अद्भुत समन्वय था, जिसने श्रोताओं को सुखद अनुभूतियां दी। उनके साथ तबले पर डॉ. विनय बिंदे, ग्वालियर ने अति सुंदर संगत दी।
प्रथम दिवस की अंतिम प्रस्तुति सुप्रतिष्ठित गायिका विदुषी देवकी पण्डित, मुम्बई के गायन की रही। उन्होंने अपनी प्रस्तुति के लिये मधुर एवं सुंदर राग रागेश्री का चयन किया। उन्होंने खयाल के साथ राग का विस्तार और उसके सौंदर्य को प्रस्तुत किया, जिसके बोल ‘‘आली पलक....’’ थे। इसके बाद द्रुत बंदिश ‘‘मोरा मन बस कर लीनो श्याम....’’ प्रस्तुत कर अंत में भैरवी गायन कर प्रस्तुति को विराम दिया। उनके साथ तबले पर श्री स्वप्निल भिसे एवं हारमोनियम पर श्री अभिनय रवंदे ने संगत दी।



