संपादकीय
07 Mar, 2026

बढ़ती श्रमिक मौतें: विकास की रफ्तार के बीच चिंता का संकेत

मध्य प्रदेश में श्रमिकों की बढ़ती मौतें गंभीर चिंता का विषय हैं, इसलिए उनकी सुरक्षा, स्वास्थ्य सुधार और सरकारी योजनाओं का प्रभावी कार्यान्वयन आवश्यक है।

भारत जैसे विशाल और विकासशील देश में श्रमिक वर्ग अर्थव्यवस्था की रीढ़ माना जाता है। उद्योग, निर्माण, परिवहन, कृषि और सेवा क्षेत्र में काम करने वाले करोड़ों मजदूर देश के विकास को गति देते हैं। लेकिन हाल के वर्षों में श्रमिकों की बढ़ती मौतों के आंकड़े गंभीर चिंता का विषय बनते जा रहे हैं। विशेष रूप से मध्य प्रदेश में श्रमिकों की मौत का बढ़ता आंकड़ा प्रशासन और समाज दोनों के लिए एक बड़ा सवाल खड़ा करता है।
उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2025 में देश में लगभग 69 हजार श्रमिकों की मौत दर्ज की गई है। वहीं वर्ष 2024 से अब तक 19 हजार से अधिक श्रमिकों की मौत हो चुकी है। चिंता की बात यह है कि इन मौतों में अधिकांश श्रमिकों की उम्र 60 वर्ष से कम रही है, जबकि देश में औसत आयु लगभग 67 वर्ष मानी जाती है। इसका अर्थ यह है कि बड़ी संख्या में श्रमिक समय से पहले ही अपनी जान गंवा रहे हैं।
मध्य प्रदेश के आंकड़ों पर नजर डालें तो स्थिति और अधिक चिंताजनक दिखाई देती है। वर्ष 2023 में लगभग 48 हजार श्रमिकों की मौत दर्ज की गई थी। इसके बाद 2024 में यह संख्या बढ़कर करीब 50 हजार हो गई और 2025 में यह आंकड़ा बढ़कर लगभग 69 हजार तक पहुंच गया। यह वृद्धि दर्शाती है कि श्रमिकों की सुरक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में अभी भी बहुत काम किए जाने की आवश्यकता है।
मध्य प्रदेश में लगभग 42 क्षेत्रों में करीब 2 करोड़ असंगठित श्रमिक कार्यरत हैं। इनमें 51 लाख से अधिक महिलाएं भी शामिल हैं। असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों को अक्सर नियमित स्वास्थ्य सुविधाएं, सुरक्षा उपकरण और सामाजिक सुरक्षा का लाभ नहीं मिल पाता। यही कारण है कि इस वर्ग में दुर्घटनाओं, बीमारियों और समय से पहले मौत की घटनाएं अधिक देखने को मिलती हैं।
निर्माण स्थलों, औद्योगिक इकाइयों, फैक्ट्रियों और कृषि क्षेत्र में कार्य करने वाले मजदूरों को अक्सर कठिन परिस्थितियों में काम करना पड़ता है। कई स्थानों पर न तो प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र उपलब्ध हैं और न ही आपातकालीन चिकित्सा व्यवस्था। ऐसे में अचानक बीमारी या दुर्घटना होने पर समय पर उपचार नहीं मिल पाता, जो कई बार मौत का कारण बन जाता है।
श्रमिकों की मौत के मामलों में सरकार द्वारा मुआवजा भी दिया जाता है। हर साल लगभग 1200 से 1500 करोड़ रुपये तक का मुआवजा विभिन्न योजनाओं के माध्यम से दिया जाता है। हालांकि मुआवजे की राशि लगातार बढ़ रही है, लेकिन इसके बावजूद मौतों का आंकड़ा कम होने के बजाय बढ़ता जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि केवल मुआवजा देना समस्या का स्थायी समाधान नहीं है। जरूरत इस बात की है कि श्रमिकों के स्वास्थ्य, सुरक्षा और कार्य परिस्थितियों में सुधार किया जाए। यदि दुर्घटनाओं और बीमारियों को पहले ही रोक लिया जाए तो कई कीमती जानें बचाई जा सकती हैं।
मध्य प्रदेश सरकार द्वारा श्रमिकों के लिए कई योजनाएं चलाई जा रही हैं, जिनमें मुख्यमंत्री जनकल्याण संबल योजना प्रमुख है। इस योजना के तहत असंगठित श्रमिकों का पंजीकरण कर उन्हें सामाजिक सुरक्षा और आर्थिक सहायता प्रदान की जाती है।
हालांकि योजना के तहत लाखों श्रमिक पंजीकृत हैं, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि अभी भी बड़ी संख्या में श्रमिक इस दायरे से बाहर हैं। कई मामलों में श्रमिकों की मौत का पंजीकरण भी नहीं हो पाता, जिसके कारण वास्तविक आंकड़े सामने नहीं आ पाते। वर्ष 2024 में लगभग 12 हजार और 2023 में 21 हजार से अधिक मौतें ऐसी बताई गई हैं जो आधिकारिक रूप से दर्ज नहीं हो पाईं।
श्रमिकों की मौत के पीछे कई कारण सामने आते हैं। इनमें अत्यधिक काम का दबाव, खराब कार्य परिस्थितियां, स्वास्थ्य जांच की कमी, दुर्घटनाएं और पुरानी बीमारियां प्रमुख हैं। विशेष रूप से उच्च रक्तचाप, मधुमेह और हृदय रोग जैसी बीमारियां श्रमिकों में तेजी से बढ़ रही हैं।
विशेषज्ञों का सुझाव है कि श्रमिकों की नियमित स्वास्थ्य जांच अनिवार्य की जानी चाहिए। इसके लिए श्रम विभाग को स्वास्थ्य, पुलिस, परिवहन और नगरीय प्रशासन विभाग के साथ समन्वय बनाकर काम करना होगा। औद्योगिक क्षेत्रों, निर्माण स्थलों और कृषि क्षेत्रों के आसपास स्वास्थ्य सुविधाएं विकसित करना भी बेहद जरूरी है।
श्रम विभाग के अनुसार 2 फरवरी को प्रदेश के सभी कलेक्टरों को पत्र लिखकर निर्देश दिए गए हैं कि कार्य के दौरान होने वाली मौतों के कारणों की समीक्षा की जाए। यह कदम महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि इससे यह पता लगाया जा सकेगा कि किन परिस्थितियों में श्रमिकों की मौत हो रही है और उन्हें कैसे रोका जा सकता है।
यदि जिलास्तर पर नियमित निगरानी और समीक्षा की जाए तो कई जोखिमों को पहले ही चिन्हित किया जा सकता है। इससे श्रमिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए ठोस कदम उठाए जा सकते हैं।
आंकड़ों के अनुसार 60 वर्ष से कम उम्र के लगभग 90 प्रतिशत श्रमिकों की मौत कामकाजी उम्र में ही हो रही है। यह स्थिति बेहद चिंताजनक है क्योंकि यही वह आयु होती है जब व्यक्ति अपने परिवार की आर्थिक जिम्मेदारियां निभा रहा होता है। ऐसे में उसकी अचानक मृत्यु परिवार को आर्थिक और सामाजिक संकट में डाल देती है।
श्रमिकों की बढ़ती मौतों को रोकने के लिए बहुआयामी प्रयासों की आवश्यकता है। सबसे पहले श्रमिकों की सुरक्षा और स्वास्थ्य को प्राथमिकता देनी होगी। औद्योगिक और निर्माण स्थलों पर सुरक्षा मानकों का सख्ती से पालन कराया जाना चाहिए।
इसके अलावा नियमित स्वास्थ्य जांच, स्वास्थ्य बीमा, आपातकालीन चिकित्सा सुविधा और सुरक्षित कार्य वातावरण उपलब्ध कराना जरूरी है। असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों का अधिक से अधिक पंजीकरण भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए ताकि उन्हें सरकारी योजनाओं का लाभ मिल सके।
श्रमिक किसी भी समाज की उत्पादन शक्ति का आधार होते हैं। यदि वही वर्ग असुरक्षित और उपेक्षित रहेगा तो विकास की प्रक्रिया भी अधूरी रह जाएगी। मध्य प्रदेश में श्रमिकों की बढ़ती मौतें एक गंभीर चेतावनी हैं कि अब केवल योजनाएं बनाने से काम नहीं चलेगा, बल्कि उन्हें प्रभावी तरीके से लागू भी करना होगा।
सरकार, प्रशासन, उद्योग और समाज सभी को मिलकर यह सुनिश्चित करना होगा कि श्रमिक सुरक्षित वातावरण में काम कर सकें और समय से पहले मौत का शिकार न हों। तभी सच्चे अर्थों में श्रमिकों के कल्याण और सामाजिक न्याय का लक्ष्य प्राप्त किया जा सकेगा।
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