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11 Mar, 2026

निजी स्कूलों की मनमानी पर प्रशासन बेबस एनसीईआरटी अनिवार्यता के बावजूद अभिभावकों की जेब पर बोझ

एनसीईआरटी किताबें अनिवार्य होने के बावजूद निजी स्कूल महंगी किताबें थोप रहे हैं। अभिभावक आर्थिक दबाव में, प्रशासन निष्क्रिय, शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता और नियम पालन जरूरी।

देश में स्कूली शिक्षा को सुलभ और किफायती बनाने के उद्देश्य से सरकार ने एनसीईआरटी की पुस्तकों को अनिवार्य करने जैसे कई महत्वपूर्ण निर्णय लिए हैं। इन निर्णयों का उद्देश्य शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता लाना और अभिभावकों पर पड़ने वाले अनावश्यक आर्थिक बोझ को कम करना है। लेकिन जमीनी स्तर पर स्थिति इससे बिल्कुल विपरीत नजर आती है। प्रदेश के कई शहरों में निजी स्कूलों की मनमानी इस कदर बढ़ गई है कि प्रशासन और स्कूल शिक्षा विभाग उनके सामने बौने साबित होते दिखाई दे रहे हैं।
एनसीईआरटी की किताबों को अनिवार्य किए जाने के बावजूद अधिकांश निजी स्कूल अपने पाठ्यक्रम में निजी प्रकाशकों की महंगी किताबें शामिल कर रहे हैं। इतना ही नहीं, कई स्कूल अभिभावकों को विशेष रूप से चिन्हित दुकानों से ही किताबें खरीदने का निर्देश दे रहे हैं। यह स्थिति सीधे-सीधे सरकारी नियमों का उल्लंघन है, लेकिन इसके बावजूद प्रशासनिक स्तर पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हो पा रही है।
सरकार और शिक्षा विभाग स्पष्ट रूप से यह निर्देश दे चुके हैं कि स्कूलों में एनसीईआरटी की किताबों का उपयोग किया जाए। इसका उद्देश्य यह है कि पूरे देश में एक समान और सस्ती शिक्षा सामग्री उपलब्ध हो सके। एनसीईआरटी की किताबें अपेक्षाकृत कम कीमत पर उपलब्ध होती हैं और उनका पाठ्यक्रम भी राष्ट्रीय स्तर पर तय किया गया होता है। इसके बावजूद निजी स्कूलों द्वारा निजी प्रकाशकों की किताबें कोर्स में शामिल की जा रही हैं। इन किताबों की कीमत कई गुना अधिक होती है। कई बार एक कक्षा की किताबों का सेट हजारों रुपये तक पहुंच जाता है। इससे अभिभावकों पर आर्थिक दबाव बढ़ता है और शिक्षा का खर्च लगातार बढ़ता जाता है।
सबसे गंभीर समस्या यह है कि कई निजी स्कूल अभिभावकों को किसी एक या दो चिन्हित दुकानों से ही किताबें खरीदने के लिए मजबूर करते हैं। स्कूल प्रबंधन द्वारा अभिभावकों को जो सूची दी जाती है, उसमें दुकानों के नाम भी बताए जाते हैं। इससे अभिभावकों के पास विकल्प ही नहीं बचता और उन्हें मजबूरी में वहीं से महंगी किताबें खरीदनी पड़ती हैं।
सरकारी नियमों के अनुसार कोई भी स्कूल अभिभावकों को किसी एक दुकान से किताब खरीदने के लिए बाध्य नहीं कर सकता। स्कूलों को केवल किताबों की सूची अपने नोटिस बोर्ड पर प्रदर्शित करनी होती है और उनकी कीमत भी स्पष्ट रूप से लिखनी होती है। लेकिन वास्तविकता यह है कि इन नियमों का पालन शायद ही कहीं होता दिखाई देता है।
यह आश्चर्य की बात है कि प्रशासन और स्कूल शिक्षा विभाग को इन सभी गतिविधियों की जानकारी होने के बावजूद भी कार्रवाई नहीं हो रही है। कई बार अभिभावकों द्वारा शिकायतें भी की जाती हैं, लेकिन कार्रवाई का अभाव देखने को मिलता है। इससे निजी स्कूलों का मनोबल और बढ़ता जा रहा है।
प्रशासनिक अधिकारियों और जिला शिक्षा विभाग की जिम्मेदारी है कि वे इस प्रकार की अनियमितताओं पर सख्ती से कार्रवाई करें। यदि नियमों का पालन नहीं हो रहा है, तो संबंधित स्कूलों के खिलाफ दंडात्मक कदम उठाए जाने चाहिए। लेकिन वर्तमान स्थिति में प्रशासन निजी स्कूलों की मनमानी के सामने नतमस्तक नजर आ रहा है।
अधिकांश निजी स्कूल केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड से संबद्ध होते हैं। सीबीएसई के भी स्पष्ट दिशा-निर्देश हैं कि स्कूल छात्रों पर अनावश्यक किताबों का बोझ नहीं डालेंगे और एनसीईआरटी पुस्तकों को प्राथमिकता दी जाएगी। इसके बावजूद कई स्कूल इन नियमों की अनदेखी कर रहे हैं।
इसके साथ ही यह भी नियम है कि स्कूल तीन साल तक किताबों में बदलाव नहीं कर सकते। इससे अभिभावक पुराने छात्रों की किताबें दोबारा उपयोग कर सकते हैं और खर्च कम हो सकता है। लेकिन कई स्कूल हर साल नई किताबों की सूची जारी कर देते हैं, जिससे अभिभावकों को हर बार नया सेट खरीदना पड़ता है।
एनसीईआरटी की किताबों की पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित करना जिला शिक्षा अधिकारी की जिम्मेदारी होती है। यदि बाजार में किताबें आसानी से उपलब्ध होंगी, तो निजी स्कूलों को महंगी निजी किताबें लागू करने का अवसर कम मिलेगा।
लेकिन कई जगह यह देखा गया है कि एनसीईआरटी की किताबों की उपलब्धता समय पर नहीं होती। इस स्थिति का फायदा उठाकर निजी स्कूल निजी प्रकाशकों की किताबें लागू कर देते हैं। इसलिए जिला स्तर पर किताबों की उपलब्धता सुनिश्चित करना भी बेहद जरूरी है।
इस पूरी व्यवस्था में सबसे अधिक नुकसान अभिभावकों को उठाना पड़ रहा है। बढ़ती फीस, महंगी किताबें और अन्य खर्चों के कारण शिक्षा का खर्च लगातार बढ़ता जा रहा है। मध्यम वर्ग और निम्न आय वर्ग के परिवारों के लिए बच्चों की पढ़ाई कराना एक बड़ी चुनौती बनता जा रहा है।
कई अभिभावक मजबूरी में स्कूल की शर्तें मान लेते हैं, क्योंकि उन्हें डर होता है कि कहीं उनके बच्चों को स्कूल में परेशानी न हो। इसी कारण स्कूलों की मनमानी लगातार बढ़ती जा रही है।
इस समस्या का समाधान तभी संभव है, जब प्रशासन और शिक्षा विभाग सख्ती से नियमों का पालन करवाएं। सबसे पहले उन स्कूलों की पहचान की जानी चाहिए, जो निजी किताबों को अनिवार्य कर रहे हैं या चिन्हित दुकानों से किताबें खरीदने का दबाव बना रहे हैं। ऐसे स्कूलों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जानी चाहिए।
इसके अलावा अभिभावकों के लिए शिकायत दर्ज कराने की सरल व्यवस्था भी बनाई जानी चाहिए। यदि शिकायतों पर तुरंत कार्रवाई होगी, तो स्कूलों की मनमानी पर अंकुश लग सकेगा।
शिक्षा व्यवस्था का उद्देश्य बच्चों को बेहतर भविष्य देना है, न कि अभिभावकों पर आर्थिक बोझ बढ़ाना। एनसीईआरटी किताबों को अनिवार्य करने का निर्णय इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम था। लेकिन जब तक प्रशासन और शिक्षा विभाग सख्ती से नियमों का पालन नहीं करवाएंगे, तब तक निजी स्कूलों की मनमानी पर रोक लगाना मुश्किल होगा।
जरूरत इस बात की है कि प्रशासन अपनी जिम्मेदारी निभाए और शिक्षा को व्यापार बनने से रोके। तभी अभिभावकों को राहत मिलेगी और शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता और विश्वास कायम हो सकेगा।
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