नई दिल्ली, 10 मार्च।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पवित्र पृथ्वी को राष्ट्र की शक्ति का स्रोत बताते हुए एक संस्कृत सुभाषित साझा किया और इसकी महिमा के माध्यम से राष्ट्र को ऊर्जा और बल प्रदान करने की कामना की।
प्रधानमंत्री ने अपने संदेश में लिखा, यार्णवेऽधि सलिलमग्र आसीद्यां मायाभिरन्वचरन्मनीषिणः। यस्या हृदयं परमे व्योमन्त्सत्येनावृतममृतं पृथिव्याः। सा नो भूमिस्त्विषिं बलं राष्ट्रे दधातूत्तमे॥
इस सुभाषित का अर्थ है कि पृथ्वी, जिसके भीतर समुद्रों का जल है और जो चारों ओर से जल से घिरी हुई है, जिसे विद्वान अपने ज्ञान से समझते आए हैं तथा जिसका हृदय व्यापक आकाश में शाश्वत सत्य से आच्छादित है, वही पवित्र पृथ्वी हमारे श्रेष्ठ राष्ट्र को ऊर्जा और शक्ति प्रदान करे।
प्रधानमंत्री ने इस संदेश के माध्यम से राष्ट्र के लिए प्रगति और शक्ति की कामना की और भारतीय संस्कृति में छिपी आध्यात्मिक शक्ति को उजागर किया।



