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09 Mar, 2026

कच्चे तेल में आग: क्या रूसी तेल भारत को बढ़ती कीमतों के झटके से बचा पाएगा?

ब्रेंट क्रूड की कीमतें तेजी से बढ़कर 119 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच गई हैं। अमेरिका ने भारत को समुद्र में फंसे रूसी तेल के आयात के लिए 30 दिन की छूट दी है, लेकिन विशेषज्ञों के अनुसार यह राहत भारत की विशाल ऊर्जा जरूरतों के सामने बेहद सीमित है।

9 मार्च 2026, नई दिल्ली 

वैश्विक कच्चे तेल बाजार में तेज उछाल के बीच भारत के सामने ऊर्जा लागत को लेकर नई चुनौती खड़ी हो गई है। ब्रेंट क्रूड की कीमतों में अचानक भारी बढ़ोतरी के बीच संयुक्त राज्य अमेरिका ने भारत को समुद्र में पहले से लदे रूसी तेल को आयात करने के लिए 30 दिन की अस्थायी छूट दी है। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि यह राहत भारत की कुल ऊर्जा जरूरतों के मुकाबले बेहद सीमित है और बढ़ती कीमतों से होने वाले आर्थिक झटके को पूरी तरह कम नहीं कर पाएगी।

यह छूट 5 मार्च से 4 अप्रैल तक लागू रहेगी। इसके तहत भारतीय रिफाइनरियों को उन रूसी तेल कार्गो को स्वीकार करने की अनुमति दी गई है जो नए प्रतिबंध लागू होने से पहले ही जहाजों में लोड होकर समुद्र में मौजूद थे। इससे भारत के रूसी तेल आयात पर लगाए गए 25 प्रतिशत शुल्क दंड से जुड़ी कुछ पाबंदियों में अस्थायी ढील मिली है।

सीमित राहत, बड़ी मांग

पहली नजर में यह फैसला दुनिया के तीसरे सबसे बड़े तेल आयातक भारत के लिए राहत जैसा लग सकता है, लेकिन आंकड़े कुछ और ही कहानी बताते हैं।

नोमुरा की मुख्य भारत अर्थशास्त्री सोनल वर्मा के अनुसार, छूट के तहत मिलने वाला रूसी तेल भारत की विशाल ऊर्जा जरूरत के मुकाबले बहुत कम है। अनुमान है कि भारतीय रिफाइनरियों ने 1 करोड़ बैरल से अधिक रूसी कच्चा तेल खरीदा है।

करीब 1.5 करोड़ बैरल भारत के समुद्री क्षेत्र के आसपास हैं, जबकि लगभग 70 लाख बैरल सिंगापुर के पास मौजूद हैं। इसके अलावा भूमध्यसागर और स्वेज नहर से गुजर रहे कई टैंकर भी भारतीय बंदरगाहों की ओर बढ़ रहे हैं। फिर भी यह कुल आपूर्ति भारत की मांग के मुकाबले बहुत छोटी मानी जा रही है।

सोनल वर्मा के मुताबिक, उपलब्ध तेल लगभग चार दिनों की भारत की मांग के बराबर है। ऐसे में यह थोड़ी राहत जरूर दे सकता है, लेकिन स्थिति को पूरी तरह बदलने वाला नहीं है।

भारत की बड़ी खपत

भारत हर दिन करीब 50 लाख बैरल कच्चा तेल खपत करता है। इसका मतलब यह है कि समुद्र में फंसे कार्गो भारत पहुंचते ही बहुत जल्दी खपत हो सकते हैं और आपूर्ति पर इसका प्रभाव सीमित ही रहेगा।

वैश्विक बाजार में उथल-पुथल

इस बीच असली झटका अंतरराष्ट्रीय बाजार से आ रहा है। पिछले सप्ताह होर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते तेल आपूर्ति में बाधा की आशंकाओं के कारण तेल की कीमतों में तेज उछाल देखा गया। यह जलमार्ग दुनिया के लगभग 20 प्रतिशत तेल परिवहन के लिए अहम माना जाता है।

सोमवार को ब्रेंट क्रूड फ्यूचर्स की कीमत कुछ समय के लिए 119.46 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई, जो 2022 के बाद सबसे तेज उछाल में से एक है। कुवैत और इराक जैसे उत्पादक देशों द्वारा उत्पादन घटाने से भी कीमतों पर दबाव बढ़ा है।

केवल एक सप्ताह में ब्रेंट की कीमतों में 22 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि दर्ज की गई है।

भारत की अर्थव्यवस्था पर असर

भारत अपनी कुल जरूरत का लगभग 85 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है। ऐसे में तेल की कीमतों में अचानक वृद्धि का सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।

यूक्रेन युद्ध के बाद रूस से सस्ता तेल मिलने के कारण भारत को कुछ राहत मिली थी और एक समय रूस भारत के आयात का लगभग 35 प्रतिशत हिस्सा सप्लाई कर रहा था। हालांकि अब यह निर्भरता घटकर लगभग 20 प्रतिशत के आसपास आ गई है।

महंगाई और विकास पर दबाव

भारतीय रिजर्व बैंक के शोध के अनुसार कच्चे तेल की कीमतों में 10 प्रतिशत की बढ़ोतरी से महंगाई दर लगभग 0.30 प्रतिशत अंक बढ़ सकती है और सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि दर में लगभग 0.15 प्रतिशत अंक की कमी आ सकती है।

चूंकि पिछले सप्ताह ही तेल की कीमतें 20 प्रतिशत से अधिक बढ़ चुकी हैं, इसलिए इसका व्यापक आर्थिक असर काफी बड़ा हो सकता है।

शेयर बाजार पर भी दबाव

इतिहास बताता है कि जब कच्चे तेल की कीमतें तेजी से बढ़ती हैं, तो निफ्टी 50 जैसे शेयर सूचकांकों पर दबाव बढ़ जाता है। आयात बिल बढ़ने, रुपये पर दबाव और महंगाई की आशंकाओं के कारण बाजार में अनिश्चितता बढ़ सकती है।

कुल मिलाकर, अमेरिकी छूट भारत को कुछ दिनों की राहत जरूर दे सकती है, लेकिन वैश्विक तेल बाजार में बढ़ती कीमतों का दबाव अभी भी देश की अर्थव्यवस्था के लिए बड़ी चुनौती बना हुआ है।

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