बलिया, 02 मार्च 2026
होली के पर्व पर बलिया में फाग गायन की परंपरा को जीवित रखने का काम युवाओं और बुजुर्गों की साझेदारी से लगातार मजबूत हो रहा है। फगुआ यानी होली परंपराओं और लोक संस्कृति के जीवंत होने का त्योहार माना जाता है। तेजी से आधुनिक होते समाज और विदेशी संस्कृति के प्रभाव के बीच बलिया के गड़हांचल क्षेत्र में फाग गायन की परंपरा आज भी मजबूती से कायम है। इसके पीछे युवाओं का उत्साह और बुजुर्गों का मार्गदर्शन प्रमुख भूमिका निभा रहा है।
गांवों में फाग गायन की पुरानी परंपरा रही है, लेकिन पलायन के कारण कई गांवों में यह परंपरा कमजोर पड़ने लगी है। इसके बावजूद बलिया के गड़हांचल क्षेत्र में फाग गीतों की परंपरा लगातार आगे बढ़ रही है। गड़हांचल के सुरही गांव में लगभग पचास वर्षों से फाग परंपरा को जीवित रखने का काम सेवानिवृत्त शिक्षक और राज्यपाल पुरस्कार प्राप्त सर्वचन्द्र राय कर रहे हैं। उन्होंने हर वर्ष की तरह इस बार भी कई गांवों को फाग गायन के लिए आमंत्रित किया, जहां बुजुर्गों के मार्गदर्शन में युवाओं ने उत्साह के साथ भाग लिया।

सुरही गांव में आयोजित होली मिलन समारोह में युवाओं ने पारंपरिक वाद्य यंत्रों झाल, मंजीरा, ढोलक और डफ की थाप पर भगवान शिव और राम आधारित पारंपरिक गीतों का गायन किया। युवाओं के जोश और ऊर्जा को देखकर उपस्थित लोग हैरान रह गए। इस आयोजन में हर गांव के लिए समय और क्रम निर्धारित किया गया था। इस कार्यक्रम की तैयारी लगभग पखवाड़ा भर पहले से शुरू कर दी जाती है और गांवों की टीम पहले से अभ्यास कर कार्यक्रम में भाग लेने पहुंचती है।
आयोजनकर्ता सर्वचन्द्र राय का कहना है कि इस आयोजन का मुख्य उद्देश्य युवा पीढ़ी को अपनी लोक संस्कृति और परंपराओं से जोड़ना है। उन्होंने संतोष जताते हुए कहा कि आज के युवा डिजिटल युग में भी पुराने फाग गीतों को गाकर अपनी संस्कृति पर गर्व महसूस कर रहे हैं। रविवार देर शाम तक चले फाग मुकाबले को देखने के लिए हजारों लोग पहुंचे।



