दक्षिण एशिया
18 Feb, 2026

नेपाल और भारत के बीच आपराधिक मामलों में पारस्परिक कानूनी सहायता समझौते पर हस्ताक्षर

नेपाल और भारत ने आपराधिक मामलों में पारस्परिक कानूनी सहायता और सीमापार अपराधों की संयुक्त जांच व साक्ष्यों के आदान–प्रदान के लिए समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं।

काठमांडू, 18 फ़रवरी।

नेपाल और भारत के बीच आपराधिक मामलों में पारस्परिक कानूनी सहायता संबंधी समझौते पर हस्ताक्षर किए गए हैं, जो सीमापार अपराधों की संयुक्त जांच और साक्ष्यों के आदान–प्रदान का मार्ग खोलेगा।

समझौते पर नेपाल की ओर से कानून मंत्रालय के सह सचिव विनोदकुमार भट्टराई और भारत की ओर से नेपाल के लिए भारतीय राजदूत नवीन श्रीवास्तव ने हस्ताक्षर किए। इस अवसर पर कानून मंत्री अनिलकुमार सिन्हा, कानून सचिव पाराश्वर ढुंगाना, विदेश मंत्रालय के प्रतिनिधि और भारतीय दूतावास के कर्मचारी उपस्थित रहे। कानून मंत्रालय के सचिव ढुंगाना ने कहा कि लंबे समय से भारत के साथ इस प्रकार के समझौते पर चर्चा चल रही थी और अब इसे अंतिम रूप दिया गया है। उन्होंने बताया कि यह समझौता आपराधिक मामलों में पारस्परिक कानूनी सहायता के आदान–प्रदान, सीमा-पार अपराधों की संयुक्त जांच और ट्रांसनेशनल अपराधों में सहयोग को सुनिश्चित करेगा।

समझौते को पिछले वर्ष 17 अक्टूबर को प्रधानमंत्री सुशीला कार्की की अध्यक्षता में मंत्रिपरिषद की बैठक से स्वीकृति मिली थी। इसमें साक्ष्यों के आदान–प्रदान, जांच, अभियोजन और न्यायिक निर्णय को प्रभावी बनाने की व्यवस्था की गई है। मंत्रालय के अधिकारियों के अनुसार यह संगठित अपराध, मनी लॉन्ड्रिंग और आतंकवादी गतिविधियों में वित्तीय निवेश नियंत्रण और पारस्परिक मूल्यांकन में भी सहायक होगा।

समझौते के तहत किसी अपराध से जुड़े मामलों में व्यक्तियों को उपस्थित कराना, साक्ष्य, शपथपत्र और बयान दर्ज करना, प्रमाण जुटाना, नोटिस तामील कराना और अन्य सूचनाओं का आदान–प्रदान किया जा सकेगा। नेपाली नागरिकों के भारत में वित्तीय लेन–देन की स्थिति में बैंक विवरण प्राप्त करना आसान होगा। सचिव ढुंगाना ने बताया कि इससे पहले सहयोग की ठोस व्यवस्था न होने के कारण दोनों देशों के कानून प्रवर्तन अधिकारियों को कठिनाइयों का सामना करना पड़ता रहा।

इतिहास में उल्लेखनीय है कि वर्ष 1953 में नेपाल और भारत के बीच प्रत्यर्पण संधि हुई थी, जिसके तहत अपराधियों का आदान–प्रदान संभव हुआ, लेकिन बाद में प्रत्यर्पण संधि निष्क्रिय हो गई। वर्ष 2003 में भी सचिवस्तरीय संधि पर हस्ताक्षर हुए थे, लेकिन अनुमोदन न मिलने के कारण वह लागू नहीं हो सकी। इसके अभाव में दोनों देशों के बीच अनौपचारिक रूप से अभियुक्तों का आदान–प्रदान होता रहा।

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