कोलकाता, 16 मार्च 2026।
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 की औपचारिक शुरुआत रविवार शाम चुनाव आयोग द्वारा मतदान कार्यक्रम घोषित किए जाने के साथ हो गई। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने बताया कि राज्य की कुल 294 विधानसभा सीटों पर इस बार दो चरणों में मतदान होगा। पहले चरण में 16 जिलों की 152 सीटों पर मतदान होगा, जबकि दूसरे चरण में दक्षिण बंगाल के सात जिलों की 142 सीटों पर वोट डाले जाएंगे।
विश्लेषण से पता चलता है कि पहले चरण की 152 सीटों में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) तृणमूल कांग्रेस के मुकाबले बढ़त बनाए हुए है। वहीं, दूसरे चरण की सीटें तृणमूल कांग्रेस के मजबूत प्रभाव वाले क्षेत्रों में आती हैं, जहां पार्टी ने पिछले डेढ़ दशक में मजबूत संगठन तैयार किया है।
उत्तर बंगाल और पश्चिमी क्षेत्रों में भाजपा का प्रभाव लगातार बढ़ रहा है। हालांकि उत्तर और दक्षिण दिनाजपुर जिलों में तृणमूल और भाजपा के बीच कड़ी टक्कर देखने को मिली है। दक्षिण बंगाल में तृणमूल का पारंपरिक दबदबा है, लेकिन नदिया और उत्तर 24 परगना जैसे मतुआ बहुल क्षेत्रों में भाजपा ने अपनी पकड़ मजबूत की है।

पहले चरण की सीटों में बीरभूम जिले की 11 सीटें भी शामिल हैं, जहां पिछले 17 वर्षों से तृणमूल का मजबूत संगठनात्मक प्रभाव रहा है। इस जिले में अनुव्रत मंडल पार्टी के प्रमुख चुनाव प्रबंधक माने जाते थे। पशु तस्करी मामले में उनकी गिरफ्तारी के बावजूद तृणमूल ने जिले की दोनों लोकसभा सीटों पर जीत दर्ज की थी।
पूर्व मेदिनीपुर में भाजपा ने पिछले दो चुनावों में अपनी स्थिति मजबूत की है, जिसका श्रेय विपक्षी नेता शुभेंदु अधिकारी को दिया जाता है। वहीं, मालदा और मुर्शिदाबाद जिलों में तृणमूल का मजबूत वर्चस्व देखा गया। 2019 और 2024 के लोकसभा चुनावों में वाम दल और कांग्रेस की सीमित सफलता मुख्य रूप से उत्तर दिनाजपुर, मालदा और मुर्शिदाबाद तक ही सीमित रही।
राज्य के चुनावी इतिहास पर नजर डालें तो कई बार ऐसे परिणाम सामने आए हैं, जिनका पिछले चुनावों के रुझानों से सीधा संबंध नहीं रहा। 1977 में वाम मोर्चा पहली बार सत्ता में आया था, और 1998 में तृणमूल कांग्रेस के गठन के बाद वाम मोर्चा को झटका लगा।
2004 के लोकसभा और 2006 के विधानसभा चुनावों में वाम मोर्चा ने ऐतिहासिक जीत दर्ज की थी, लेकिन 2009 के लोकसभा चुनाव में राजनीतिक समीकरण बदलने लगे। 2008 के पंचायत चुनावों से ही बदलाव के संकेत मिलने लगे थे, जिसका परिणाम 2011 में 34 वर्षों के वाम शासन के अंत के रूप में सामने आया।
इस बार तृणमूल कांग्रेस को 15 वर्षों की सत्ता विरोधी लहर की चुनौती के बीच चुनाव मैदान में उतरना पड़ रहा है। मतदाता सूची के पुनरीक्षण के बाद यह राज्य का पहला विधानसभा चुनाव होगा, जो चुनावी समीकरणों को प्रभावित कर सकता है।



