नवरात्रि के तीसरे दिन माँ चंद्रघंटा की पूजा की जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यह देवी का वह स्वरूप है जो साहस, पराक्रम और दुष्ट शक्तियों के विनाश का प्रतीक माना जाता है। इस दिन देवी की आराधना विशेष रूप से शौर्य और आत्मविश्वास प्राप्त करने के लिए की जाती है।
पौराणिक कथाओं के अनुसार माँ चंद्रघंटा, देवी पार्वती का ही एक दिव्य रूप मानी जाती हैं। भगवान शिव से विवाह के बाद देवी ने अपने मस्तक पर अर्धचंद्र धारण किया। यह अर्धचंद्र घंटी के आकार जैसा दिखाई देता है, इसलिए उन्हें चंद्रघंटा कहा जाता है।
धार्मिक मान्यता है कि जब असुरों का अत्याचार बढ़ने लगा और देवताओं तथा मनुष्यों को कष्ट होने लगा, तब देवी ने अपने शांत रूप को छोड़कर युद्धरूप धारण किया। देवी चंद्रघंटा का यह रूप अत्यंत तेजस्वी और शक्तिशाली माना जाता है।
धार्मिक चित्रणों में देवी को सिंह पर सवार दिखाया जाता है और उनके कई हाथों में विभिन्न अस्त्र-शस्त्र होते हैं। यह स्वरूप बताता है कि देवी केवल करुणा और शांति की प्रतीक ही नहीं हैं, बल्कि आवश्यकता पड़ने पर दुष्ट शक्तियों का विनाश करने वाली शक्ति भी हैं।
पौराणिक मान्यता के अनुसार देवी के मस्तक पर स्थित दिव्य घंटा की ध्वनि से नकारात्मक शक्तियाँ और दुष्ट ऊर्जा दूर हो जाती है। इसी कारण माँ चंद्रघंटा को भक्तों की रक्षा करने वाली देवी भी कहा जाता है।
धार्मिक परंपराओं में माना जाता है कि नवरात्रि के तीसरे दिन देवी की पूजा करने से भय, संकट और मानसिक अशांति दूर होती है। श्रद्धालु इस दिन देवी की आराधना कर साहस, शक्ति और जीवन में स्थिरता की कामना करते हैं।
इसी कारण नवरात्रि का तीसरा दिन माँ चंद्रघंटा के उस दिव्य रूप को समर्पित माना जाता है, जो भक्तों को यह संदेश देता है कि सच्ची शक्ति वही है जो धर्म की रक्षा के लिए सदैव तैयार रहती है।



