संपादकीय
12 Mar, 2026

अपराध, राजनीति और लोकतंत्र का अपमान

भारतीय राजनीति में आपराधिक पृष्ठभूमि वाले नेताओं की बढ़ती संख्या लोकतंत्र की नैतिकता और जवाबदेही पर सवाल खड़ा करती है, सुधार और कठोर कदम आवश्यक हैं।

लोकतंत्र का मूल आधार पारदर्शिता, जवाबदेही और नैतिकता है। लेकिन जब जनप्रतिनिधि ही चुनावी प्रक्रिया में कानून से खेलते हुए दिखाई दें, तो यह केवल एक व्यक्ति की गलती नहीं रहती, बल्कि पूरी राजनीतिक व्यवस्था पर सवाल खड़ा कर देती है। नामांकन फार्म में आपराधिक रिकॉर्ड छुपाने के कारण उच्च न्यायालय द्वारा एक विधायक की सदस्यता रद्द किया जाना इसी सच्चाई को उजागर करता है कि भारतीय राजनीति में नैतिकता अब अपवाद बनती जा रही है। अदालत ने केवल कानून का पालन किया है, लेकिन राजनीतिक दल इसे भी भावनात्मक मुद्दों में बदलकर अपनी जिम्मेदारी से बचने की कोशिश कर रहे हैं।
चुनाव लड़ने वाला कोई भी उम्मीदवार सबसे पहले जनता के सामने अपनी सच्चाई रखने के लिए बाध्य है। यही कारण है कि सर्वोच्च अदालत ने चुनावी सुधार के तहत उम्मीदवारों के लिए अपने आपराधिक रिकॉर्ड का खुलासा करना अनिवार्य किया था। इसका उद्देश्य स्पष्ट था—मतदाता यह जान सके कि वह जिस व्यक्ति को अपना प्रतिनिधि बनाने जा रहा है, उसकी पृष्ठभूमि क्या है। लेकिन राजनीति ने इस व्यवस्था को भी एक औपचारिकता बनाकर रख दिया है। कई उम्मीदवार जानकारी छुपाने या अधूरी देने का जोखिम उठाते हैं, क्योंकि उन्हें विश्वास होता है कि राजनीतिक संरक्षण और सत्ता का दबाव उन्हें बचा लेगा।
यह बेहद चिंताजनक है कि आज देश में लगभग आधे सांसद और विधायक किसी न किसी आपराधिक मामले का सामना कर रहे हैं। यह स्थिति बताती है कि राजनीति में अपराध केवल घुसपैठ नहीं कर रहा, बल्कि धीरे-धीरे उसे नियंत्रित करने लगा है। कई मामलों में तो गंभीर आरोपों में जेल में बंद लोग भी चुनाव जीतकर विधानसभाओं और संसद तक पहुंच जाते हैं। यह लोकतंत्र की उस विडंबना को दिखाता है, जिसमें कानून बनाने वाले ही कानून के कठघरे में खड़े हैं।
इस पूरे प्रकरण में सबसे दुर्भाग्यपूर्ण पहलू यह है कि अदालत के निर्णय को स्वीकार करने के बजाय उसे राजनीतिक रंग देने की कोशिश की जा रही है। कभी इसे सामाजिक अस्मिता से जोड़ा जाता है, तो कभी न्यायपालिका की मंशा पर सवाल उठाए जाते हैं। यह प्रवृत्ति केवल न्यायपालिका ही नहीं, बल्कि लोकतंत्र की पूरी व्यवस्था को कमजोर करती है। अदालत ने कानून के आधार पर फैसला दिया है। यदि कोई उम्मीदवार नामांकन में जानकारी छुपाता है, तो वह चुनावी प्रक्रिया के साथ धोखा करता है। ऐसे व्यक्ति को जनप्रतिनिधि बने रहने देना लोकतंत्र का मजाक ही होगा।
असल समस्या यह है कि भारतीय राजनीति में नैतिक जवाबदेही लगभग समाप्त हो चुकी है। दलों के लिए उम्मीदवार की छवि से ज्यादा उसकी जीतने की क्षमता महत्वपूर्ण हो गई है। अपराधी छवि वाला व्यक्ति यदि चुनाव जिताने की क्षमता रखता है, तो राजनीतिक दल उसे टिकट देने में बिल्कुल संकोच नहीं करते। यही कारण है कि चुनाव दर चुनाव आपराधिक पृष्ठभूमि वाले नेताओं की संख्या बढ़ती जा रही है।
सिर्फ आपराधिक रिकॉर्ड सार्वजनिक कर देने से समस्या का समाधान नहीं होगा। लोकतंत्र को बचाने के लिए इससे आगे बढ़ने की आवश्यकता है। गंभीर अपराधों में आरोपित व्यक्तियों को चुनाव लड़ने से रोकने की व्यवस्था होनी चाहिए। यह तर्क दिया जाता है कि इससे कानून का दुरुपयोग हो सकता है, लेकिन हर व्यवस्था के दुरुपयोग की संभावना होती है। इस डर से सही व्यवस्था लागू न करना भी लोकतंत्र के साथ अन्याय है।
इसी तरह यह भी आवश्यक है कि यदि कोई मंत्री, मुख्यमंत्री या अन्य संवैधानिक पद पर बैठा व्यक्ति किसी आपराधिक मामले में जेल जाता है, तो उसे तत्काल अपने पद से हटना पड़े। सत्ता में रहते हुए जेल से सरकार चलाना लोकतंत्र की मर्यादा के खिलाफ है। सत्ता का उद्देश्य कानून से ऊपर उठना नहीं, बल्कि कानून के प्रति जवाबदेह होना है।
भारतीय लोकतंत्र आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहां सुधार की सख्त जरूरत है। यदि राजनीति का अपराधीकरण इसी तरह बढ़ता रहा, तो लोकतंत्र केवल चुनावों तक सीमित होकर रह जाएगा। जनता के विश्वास की रक्षा करने के लिए राजनीतिक दलों, न्यायपालिका और सरकार—तीनों को मिलकर कठोर कदम उठाने होंगे।
कानून से खिलवाड़ करने वाले नेताओं के लिए राजनीति शरणस्थली नहीं बन सकती। लोकतंत्र की रक्षा तभी संभव है जब राजनीति में प्रवेश करने वाले लोग कानून का सम्मान करना सीखें। वरना वह दिन दूर नहीं जब जनता का विश्वास इस व्यवस्था से पूरी तरह उठ जाएगा।
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