संपादकीय
11 Mar, 2026

जब जज को ही न्याय न मिले: व्यवस्था के कठघरे में खड़ा सिस्टम

देहरादून में न्यायाधीश जया पाठक की मौत ने दिखाया कि अदालत में लंबे समय तक न्याय देने वाले भी सिस्टम में असहाय महसूस कर सकते हैं। मामला संवेदनशीलता और इंसानियत पर बहस खड़ी करता है।

लोकतंत्र में अदालतें उम्मीद की आख़िरी सीढ़ी मानी जाती हैं। आम आदमी जब हर दरवाज़े से निराश हो जाता है, तब वह न्यायपालिका की ओर देखता है। लेकिन अगर उसी न्यायपालिका से जुड़ा एक न्यायाधीश अपनी ही व्यवस्था से न्याय न पा सके, तो यह केवल एक व्यक्तिगत त्रासदी नहीं रहती—यह पूरे सिस्टम की संवेदनहीनता का आईना बन जाती है। जया पाठक की मौत इसी सवाल को हमारे सामने खड़ा करती है।
यह कहानी सिर्फ एक जज की नहीं, एक मां की भी है। वर्ष 2017 में देहरादून के प्रेमनगर थाने में हुई एक घटना ने जया पाठक की पूरी ज़िंदगी बदल दी। बताया जाता है कि किसी छोटे से विवाद के बाद उनके बेटे रोहन को पुलिस थाने ले आई। आरोप है कि वहां उसके साथ मारपीट की गई। खबर मिलते ही जया पाठक थाने पहुंचीं। सामने जो दृश्य था, वह किसी भी मां के लिए असहनीय होता—बेटा पुलिस की लाठियों के बीच पिट रहा था।
उस पल अदालत की गरिमा, पद और नियम सब पीछे छूट गए। एक मां का आक्रोश सामने आया। जया पाठक ने विरोध किया, पुलिस से बहस हुई, धक्का-मुक्की हुई और मामला हाथापाई तक पहुंच गया। आरोप लगा कि उन्होंने पुलिसकर्मियों को थप्पड़ मारा। यही वह क्षण था जिसने पूरी कहानी की दिशा बदल दी।
थाने की उस रात की एक वीडियो क्लिप सामने आई। वीडियो में एक जज पुलिसकर्मियों से उलझती दिखाई दे रही थीं। लेकिन उस दृश्य के पीछे का दर्द, एक मां की घबराहट और बेटे को बचाने की बेचैनी कहीं दबकर रह गई। अगले ही दिन मामला मीडिया और प्रशासन की नजर में आया और जया पाठक खुद आरोपी के कटघरे में खड़ी कर दी गईं।
इसके बाद शुरू हुआ लंबा और थका देने वाला संघर्ष। निलंबन, जांच, कानूनी प्रक्रियाएं और सामाजिक अपमान—यह सब उनकी ज़िंदगी का हिस्सा बन गया। जिस व्यक्ति ने अदालत में वर्षों तक न्याय दिया था, वही व्यक्ति अब अपने लिए न्याय मांग रहा था। लेकिन इस संघर्ष के दौरान जो सबसे ज्यादा चर्चा में रहा, वह था उनका अकेलापन।
कहा जाता है कि घटना वाली रात उन्होंने कई अधिकारियों से संपर्क करने की कोशिश की। मदद की उम्मीद की, लेकिन निराशा हाथ लगी। सच जो भी हो, लेकिन यह तथ्य असहज कर देता है कि एक न्यायाधीश खुद को इतना असहाय महसूस कर सकता है। यदि व्यवस्था के भीतर काम करने वाला व्यक्ति ही खुद को असुरक्षित महसूस करे, तो आम नागरिक की स्थिति की कल्पना करना मुश्किल नहीं है।
इस पूरे मामले में कई सवाल हैं, जिनके जवाब अभी भी समाज खोज रहा है। क्या पुलिस की कार्रवाई उचित थी? क्या एक मां की प्रतिक्रिया को केवल अपराध की तरह देखा जाना चाहिए था? क्या व्यवस्था में संवाद और संवेदनशीलता की जगह खत्म हो चुकी है?
यह भी सच है कि कानून सबके लिए बराबर होता है। चाहे वह आम नागरिक हो या न्यायाधीश—कानून को हाथ में लेना सही नहीं माना जा सकता। लेकिन कानून की प्रक्रिया का उद्देश्य केवल दंड देना नहीं, बल्कि न्याय सुनिश्चित करना भी होता है। जब प्रक्रिया ही कठोर और असंवेदनशील लगने लगे, तब न्याय का मूल भाव खोने लगता है।
जया पाठक की मौत ने एक गहरी बेचैनी पैदा कर दी है। यह हमें सोचने पर मजबूर करती है कि क्या हमारे संस्थान इतने औपचारिक और कठोर हो चुके हैं कि उनमें मानवीय पीड़ा के लिए जगह नहीं बची? क्या सिस्टम के भीतर काम करने वाले लोग भी उसी सिस्टम के सामने असहाय हो सकते हैं?
जया पाठक की कहानी हमें याद दिलाती है कि न्याय केवल अदालत के फैसलों में नहीं होता, बल्कि उस संवेदनशीलता में भी होता है जो हर इंसान की गरिमा को बचाए रखे। अगर एक जज की आवाज भी व्यवस्था में दब सकती है, तो यह चेतावनी है—सिर्फ न्यायपालिका के लिए नहीं, बल्कि पूरे लोकतांत्रिक ढांचे के लिए। 
|
आज का राशिफल

पूर्व नियोजित कार्यक्रम सरलता से संपन्न हो जाएंगे। जोखिम से दूर रहना ही बुद्घिमानी होगी। शुभ कार्यों की प्रवृत्ति बनेगी और शुभ समाचार भी मिलेंगे। किसी से कहा सुनी न हो यही ध्यान रहे। अपना कार्य दूसरों के सहयोग से बना लेंगे। लाभकारी गतिविधियों में सक्रियता रहेगी। शुभांक-1-4-6

आज का मौसम

भोपाल

16° / 26°

Rainy

ट्रेंडिंग न्यूज़

मुख्यमंत्री डॉ. यादव नेपानगर में 127 विकास कार्यों की सौगात के साथ जनजातीय सम्मेलन में हुए शामिल

मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने नेपानगर विधानसभा क्षेत्र में 127 विकास कार्यों की सौगात दी और जनजातीय सम्मेलन में किसानों और जनप्रतिनिधियों से योजनाओं का परिचय साझा किया।

ट्रंप ने नाटो को होर्मुज सुरक्षा में सहयोग का दिया कड़ा संदेश

अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने यूरोपीय देशों को चेतावनी दी कि यदि नाटो होर्मुज जलडमरूमध्य की सुरक्षा में मदद नहीं करता तो इसका भविष्य बहुत बुरा होगा।

श्रीनगर में एशिया के सबसे बड़े ट्यूलिप गार्डन का उद्घाटन, उमर अब्दुल्ला ने किया लोकार्पण

कश्मीर में वसंत ऋतु के आगमन के अवसर पर श्रीनगर में एशिया के सबसे बड़े ट्यूलिप गार्डन का उद्घाटन मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने किया और पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र बना।

१५ मार्च की एकादशी: वह रात जब आस्था, संयम और ब्रह्मांडीय समय एक साथ आते हैं

१५ मार्च की पापमोचनी एकादशी केवल व्रत नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि का दिन मानी जाती है—मान्यता है कि इस दिन का उपवास पुराने कर्मों को हल्का कर देता है।

एकादशी का रहस्य: जब भगवान विष्णु की दिव्य शक्ति ने जन्म लिया और अधर्म को चुनौती दी

हजारों साल पुरानी कथा कहती है कि एक भयंकर दैत्य के आतंक से संसार कांप उठा, तब भगवान विष्णु की दिव्य शक्ति से जन्मी “एकादशी” ने अधर्म का अंत किया।