देश की न्याय व्यवस्था की सबसे बड़ी ताकत उसका नैतिक अधिकार और जनता का विश्वास है। अदालत जब किसी अपराधी को दुष्कर्म और हत्या जैसे जघन्य अपराधों में आजीवन कारावास की सजा सुनाती है, तो यह केवल एक व्यक्ति को दंड देना नहीं होता, बल्कि समाज को यह भरोसा दिलाना होता है कि न्याय जिंदा है। लेकिन जब वही सजायाफ्ता अपराधी पैरोल के नाम पर जेल से बाहर आकर धार्मिक पर्यटन करते दिखाई दें, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या न्याय व्यवस्था का भय और सम्मान केवल कागजों तक सीमित रह गया है।
शंकराचार्य गेट से रामलला के दरबार तक आसाराम का पहुंचना और वहां आधे घंटे तक रुककर दर्शन करना केवल एक साधारण घटना नहीं है। यह उस व्यवस्था के मुंह पर एक खुली चुनौती है, जिसने उसे दुष्कर्म के अपराध में दोषी ठहराकर आजीवन कारावास की सजा दी है। इलाज के नाम पर पैरोल मांगना और फिर उसी दौरान धार्मिक स्थलों की यात्रा करना न्याय व्यवस्था के साथ एक भद्दा मजाक प्रतीत होता है।
आसाराम अकेला उदाहरण नहीं है। राम रहीम भी हत्या और दुष्कर्म जैसे गंभीर अपराधों में सजा काट रहा है, लेकिन समय-समय पर पैरोल लेकर बाहर आता है और सार्वजनिक जीवन में सक्रिय नजर आता है। यह दृश्य समाज के सामने एक विचित्र विरोधाभास खड़ा करता है—एक तरफ अदालतें कठोर सजा सुनाती हैं, दूसरी तरफ वही अपराधी जेल से बाहर घूमते दिखाई देते हैं।
पैरोल का उद्देश्य मानवीय आधार पर अस्थायी राहत देना होता है। गंभीर बीमारी, पारिवारिक संकट या विशेष परिस्थितियों में यह व्यवस्था बनाई गई है। लेकिन जब पैरोल प्रभावशाली अपराधियों के लिए “आराम और पर्यटन” का साधन बन जाए, तो यह पूरी व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न लगा देता है। क्या यह सुविधा केवल उन लोगों के लिए है, जिनके पास धन, प्रभाव और समर्थकों की भीड़ है?
देश की जेलों में हजारों सामान्य कैदी ऐसे हैं, जो मामूली अपराधों में सजा काट रहे हैं। उनकी जिंदगी सलाखों के पीछे बीत जाती है, लेकिन उन्हें पैरोल मिलना तो दूर, उनकी अर्जी पर सुनवाई तक नहीं होती। कई परिवार वर्षों तक इंतजार करते रहते हैं कि शायद किसी दिन उनके प्रियजन को कुछ दिनों की राहत मिल जाए। लेकिन जब जघन्य अपराधों में दोषी ठहराए गए लोग बार-बार पैरोल लेकर बाहर दिखाई देते हैं, तो यह न्याय की समानता पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
शंकराचार्य गेट से रामलला के दरबार तक आसाराम की मौजूदगी केवल प्रशासनिक ढिलाई नहीं है, बल्कि यह उस संवेदनशील मुद्दे को छूती है, जहां कानून और आस्था आमने-सामने खड़े दिखाई देते हैं। आस्था का सम्मान होना चाहिए, लेकिन क्या आस्था के नाम पर अदालत की सजा को हल्का किया जा सकता है? क्या दुष्कर्म और हत्या जैसे अपराधों में दोषी ठहराए गए व्यक्ति को धार्मिक मंचों पर सम्मानित उपस्थिति का अवसर मिलना चाहिए?
इस तरह की घटनाएं समाज को खतरनाक संदेश देती हैं। जब प्रभावशाली अपराधी कानून की सीमाओं को लांघते हुए दिखाई देते हैं, तो आम नागरिक के मन में यह धारणा बनने लगती है कि न्याय व्यवस्था दो हिस्सों में बंटी हुई है—एक ताकतवर लोगों के लिए और दूसरी आम नागरिक के लिए।
जरूरत इस बात की है कि पैरोल की प्रक्रिया को सख्त, पारदर्शी और जवाबदेह बनाया जाए। विशेषकर दुष्कर्म और हत्या जैसे जघन्य अपराधों में सजा पाए कैदियों के लिए पैरोल अपवाद होनी चाहिए, न कि एक नियमित सुविधा। अगर इलाज के आधार पर पैरोल दी जाती है, तो उसका उपयोग केवल इलाज तक सीमित रहना चाहिए।
न्याय व्यवस्था की गरिमा तभी बची रह सकती है, जब कानून का डंडा सब पर बराबर चले। वरना यह सवाल और भी तेज आवाज में उठेगा—क्या हमारे देश में न्याय वास्तव में अंधा है, या फिर वह ताकतवरों के सामने आंखें मूंद लेता है?