त्योहार
02 Mar, 2026

बस्तर में रियासतकालीन परंपराओं के साथ अनूठी होली, देवी-देवताओं की पूजा से होगा होलिका दहन

बस्तर संभाग में सदियों पुरानी रियासतकालीन परंपराओं के अनुसार देवी-देवताओं की आराधना के साथ होलिका दहन किया जाएगा, जहां भक्त प्रहलाद और होलिका की कथा गौण मानी जाती है।

जगदलपुर, 02 मार्च 2026

छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में होली का पर्व अपनी विशिष्ट और रियासतकालीन धार्मिक परंपराओं के साथ मनाया जाता है। यहां होलिका दहन की परंपरा भक्त प्रहलाद और होलिका की कथा से अलग होकर देवी-देवताओं की आराधना से जुड़ी हुई है। बस्तर में सोमवार देर रात दंतेवाड़ा, माड़पाल और जगदलपुर की जोड़ा होलिका दहन परंपराओं का सदियों पुराना निर्वहन किया जाएगा। यहां होली पर्व में भगवान विष्णु के विभिन्न अवतारों और स्थानीय देवी-देवताओं की पूजा के साथ रंगों का उत्सव मनाया जाता है, जिसमें ग्रामीणों की आस्था और सांस्कृतिक विरासत स्पष्ट दिखाई देती है।

बस्तर की होली में भक्त प्रहलाद और होलिका की कथा गौण मानी जाती है। यहां भगवान विष्णु के कृष्ण रूप और कलियुग के अवतार कल्कि के साथ माता दंतेश्वरी, माता मावली और अन्य स्थानीय देवी-देवताओं की पूजा परंपरागत रीति से की जाती है। बस्तर संभाग के गांवों में होली के अवसर पर धार्मिक विश्वास और सांस्कृतिक परंपराओं का अनूठा संगम देखने को मिलता है। ग्रामीण क्षेत्रों में उत्साह और श्रद्धा के साथ इस पर्व का आयोजन किया जाता है।

जिला मुख्यालय से लगभग 20 किलोमीटर दूर पुसपाल गांव में होलिका दहन नहीं किया जाता है। यहां होली के स्थान पर माता मंदिर में विराजित सात देवियों जिनमें बहिनिया शीतला, धारणी देवी, परदेसिन देवी, भंडारिन देवी और महामाया देवी सहित महादेव की पूजा के बाद होली मेले का आयोजन किया जाता है। मेले में मनोरंजन के लिए प्रसिद्ध नाट मंडली को आमंत्रित किया जाता है, जो आयोजन का मुख्य आकर्षण होता है। इस मेले का आयोजन लगभग 500 परिवारों के सहयोग से किया जाता है और आसपास के 25 गांवों के देवी-देवता भी इसमें शामिल होते हैं।

दंतेवाड़ा की फागुन मंडई और रियासतकालीन परंपरा के अनुसार 9 दिनों तक चलने वाले आखेट नवरात्र पूजा विधान के बाद आंवरामार पूजा और सती सीता स्थल के समीप बस्तर की पहली होलिका दहन की जाएगी। यहां होलिका दहन में बांस का ढांचा और ताड़-फलंगा धोनी पूजा में उपयोग होने वाले ताड़ के पत्तों से होलिका कुंड सजाया जाता है। इस दहन में सात प्रकार की लकड़ियों का उपयोग किया जाता है, जिनमें ताड़, बेर, साल, पलाश, बांस, कनियारी और चंदन की लकड़ियां शामिल हैं।

माड़पाल में रियासतकालीन दूसरी होलिका दहन की परंपरा आज भी जीवित है। कहा जाता है कि सन् 1408 में महाराजा पुरुषोत्तम देव भगवान जगन्नाथ के भक्त के रूप में लौटते समय माड़पाल में रुके थे और वहीं उन्होंने होलिका दहन किया था। तब से यह परंपरा लगातार जारी है। यहां राजपरिवार के सदस्य छोटे रथ पर सवार होकर होलिका कुंड की परिक्रमा करते हैं और मां दंतेश्वरी की पूजा के बाद होलिका दहन किया जाता है।

जगदलपुर में सिरहसार भवन और मावली मंदिर के बीच जोड़ा होलिका दहन की परंपरा भी रियासतकाल से चली आ रही है। पहले माड़पाल की अग्नि यहां लाई जाती थी, लेकिन अब अग्नि नहीं लाई जाती, फिर भी परंपरा के अनुसार दहन किया जाता है। 360 घर आरण्यक ब्राह्मण समाज द्वारा इस रियासतकालीन परंपरा का निर्वहन लगातार किया जा रहा है। मावली मंदिर और कलंकी मंदिर के समर्पित इस परंपरा के तहत जोड़ा होलिका दहन की अग्नि से शहर की अन्य होलिकाएं भी जलाई जाती हैं।

रंगपंचमी की पूर्व संध्या पर ग्राम कलचा में भी होलिका दहन की परंपरा निभाई जाती है। यहां होली की रात दहन नहीं होता और अगले दिन रंग-गुलाल नहीं खेला जाता। रंगपंचमी के दिन ही रंगोत्सव मनाया जाता है। माड़पाल में राजा के उत्सव में शामिल होने की परंपरा के कारण कलचा में यह विशेष व्यवस्था बनी हुई है।

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