देश की राजनीति एक बार फिर निर्णायक मोड़ पर खड़ी है। आगामी 16 मार्च को 10 राज्यों की 37 राज्यसभा सीटों पर चुनाव होने हैं। इन चुनावों ने सत्ताधारी गठबंधन और विपक्ष, दोनों के लिए रणनीतिक महत्व का रूप ले लिया है। विधानसभाओं का अंकगणित जहां कई राज्यों में तस्वीर साफ करता दिख रहा है, वहीं कुछ राज्यों में स्थिति बेहद फिसलनभरी है। ऐसे में जोड़-तोड़, समीकरण और “सेनमारी” की आशंका ने सियासी तापमान बढ़ा दिया है।
वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य गठबंधन राजनीति का है। चाहे वह राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) हो या विपक्षी दलों का व्यापक मोर्चा, दोनों को अपने-अपने सहयोगियों को साधे रखना बड़ी चुनौती बन गया है। राज्यसभा चुनावों में जीत का गणित सीधा-सा दिखता है—विधानसभा में विधायकों की संख्या को रिक्त सीटों से भाग देकर आवश्यक कोटा तय होता है। जिन दलों के पास “कंफर्टेबल” बहुमत है, वहां परिणाम लगभग तय माने जा रहे हैं। लेकिन जहां आंकड़े सीमा रेखा पर टिके हैं, वहां छोटी पार्टियों और निर्दलीय विधायकों की भूमिका निर्णायक हो जाती है।
बिहार में सत्ताधारी और विपक्षी गठबंधन, दोनों के लिए आंतरिक एकजुटता बनाए रखना अहम है। यहां राजनीतिक निष्ठाएं अक्सर बदलती रही हैं। यदि एक-दो विधायक भी पाला बदलते हैं, तो परिणाम उलट सकते हैं। महाराष्ट्र में पहले से ही गठबंधन समीकरण जटिल हैं। शिवसेना और एनसीपी में हुए विभाजन के बाद स्थिति और पेचीदा हो गई है। पूर्व केंद्रीय मंत्री शरद पवार का कार्यकाल समाप्त हो रहा है। उन्हें पुनः सदन में भेजना उनके दल के लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न है।
असम में सत्ताधारी दल अपेक्षाकृत मजबूत स्थिति में है, लेकिन विपक्ष छोटे दलों के सहारे समीकरण बिगाड़ने की कोशिश में है। तेलंगाना में हालिया राजनीतिक बदलावों ने सत्ता संतुलन को प्रभावित किया है। यहां विपक्षी दलों की एकजुटता और क्रॉस वोटिंग की संभावना चुनाव को रोचक बना सकती है। छत्तीसगढ़, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा और पश्चिम बंगाल में भी कई सीटों पर मुकाबला दिलचस्प रहने की संभावना है। छत्तीसगढ़ में दो, हिमाचल प्रदेश में एक, हरियाणा में दो और पश्चिम बंगाल में पांच सीटों पर चुनाव प्रस्तावित हैं। इन राज्यों में कुछ सीटों पर स्पष्ट बहुमत है, तो कुछ पर मामूली अंतर ही परिणाम तय करेगा।
इस बार कई वरिष्ठ नेताओं का कार्यकाल समाप्त हो रहा है। इनमें प्रमुख हैं रामदास अठावले, हरिवंश नारायण सिंह, अभिषेक मनु सिंघवी और प्रियंका चतुर्वेदी। इन नेताओं को पुनः उच्च सदन में भेजना संबंधित दलों के लिए न केवल राजनीतिक आवश्यकता है, बल्कि प्रतिष्ठा का विषय भी है। पहले जब ये नेता राज्यसभा पहुंचे थे, तब दलों के पास आरामदायक बहुमत था, लेकिन अब परिस्थितियां बदल चुकी हैं।
जहां बहुमत स्पष्ट नहीं है, वहां “ऑपरेशन” की चर्चाएं तेज हैं। राजनीतिक गलियारों में “ऑपरेशन लोटस” जैसे शब्दों का जिक्र होता रहा है, हालांकि हर दल अपने स्तर पर संख्या प्रबंधन में जुटा है। राज्यसभा चुनाव गुप्त मतदान से नहीं, बल्कि खुली मतपत्र प्रणाली से होते हैं, जिससे दल-बदल की संभावना सीमित होती है। फिर भी यदि कोई विधायक पार्टी व्हिप के विरुद्ध वोट देता है, तो उसकी सदस्यता पर खतरा मंडरा सकता है। ऐसे में दलों के लिए अपने विधायकों को एकजुट रखना प्राथमिकता है।
राज्यसभा चुनाव केवल संख्या का खेल नहीं, बल्कि राजनीतिक रसायन का भी इम्तिहान है। जहां अंकगणित साथ देता है, वहां भी यदि सहयोगी दल असंतुष्ट हों, तो परिणाम अप्रत्याशित हो सकते हैं। एनडीए 20 से 23 सीटों पर जीत का दावा कर रहा है, जबकि विपक्ष 13 से 16 सीटों पर मजबूती से खड़ा दिख रहा है। लेकिन अंतिम नतीजा इस बात पर निर्भर करेगा कि गठबंधन के भीतर कितनी एकजुटता है और छोटे दल कितनी मजबूती से अपने पक्ष में खड़े रहते हैं।
छोटे दलों के सामने दोहरी चुनौती है—अपनी राजनीतिक प्रासंगिकता बनाए रखना और बड़े दलों के दबाव व प्रलोभन से बचना। राज्यसभा चुनाव उन्हें अपनी सौदेबाजी क्षमता दिखाने का अवसर भी देते हैं। कई बार समर्थन के बदले नीतिगत या राजनीतिक लाभ हासिल किए जाते हैं।
आगामी राज्यसभा चुनाव केवल 37 सीटों का मामला नहीं है, बल्कि यह गठबंधन राजनीति की मजबूती, दलों की आंतरिक एकता और राजनीतिक रणनीति की बड़ी परीक्षा है। जहां कुछ राज्यों में तस्वीर स्पष्ट है, वहीं कई जगह परिणाम अंतिम क्षण तक अनिश्चित रहेंगे। दिग्गज नेताओं का भविष्य, छोटे दलों की भूमिका और गठबंधनों की स्थिरता—ये सभी कारक मिलकर आने वाले चुनाव को अत्यंत महत्वपूर्ण बना रहे हैं। अब नजर 16 मार्च पर टिकी है, जब यह स्पष्ट होगा कि किस गठबंधन की रणनीति सफल होती है और किसे राजनीतिक झटका लगता है। गठबंधन युग की राजनीति में हर सीट की कीमत है और यही इस चुनाव को असाधारण बनाती है।


