मध्य प्रदेश की राजनीति के सत्ता गलियारों से जुड़ी अंदरूनी हलचल, मंत्रिमंडल अटकलें, राज्यसभा समीकरण और सदन की घटनाओं का विश्लेषण प्रस्तुत करता आलेख।
सत्ता के गलियारों से,,,,
1= हमारी भी सुनोगे सरकार
पिछले दिनों विधानसभा में अपने क्षेत्र के लोगों की समस्याओं का बड़ा बंडल लेकर कुछ कार्यकर्ता माननीय मंत्री जी के पास आए। उम्मीद थी कि मंत्री जी तत्काल समस्याओं का समाधान करेंगे। मंत्री जी ने सभी की समस्याओं को सुना और कलेक्टर, संबंधित अधिकारियों एवं मंत्रालय के अधिकारियों को भेजने की बात कही। कुछ कार्यकर्ताओं ने जब दबाव बनाया—“साहब, बहुत जरूरी है, हमारी भी सुन लिया करो, क्योंकि हमें क्षेत्र में जवाब देना पड़ता है।” इस पर माननीय मंत्री जी खीझ पड़े और उनके मुंह से यह निकला कि “भैया, हमारी ही कोई नहीं सुन रहा है तो तुम लोगों की कौन सुनेगा।” साहब कई बार अधिकारियों से अपनी और कार्यकर्ताओं की समस्याओं को हल करने के लिए कह चुके हैं, परंतु उनका मानना है कि अधिकारी सुनते नहीं हैं। अब कार्यकर्ता चुप थे—जब हमारे साहब की ही कोई नहीं सुन रहा, तो हमारी कौन सुनेगा।
2= शायद किस्मत चमक जाए,,,,,,
सरकार में वजनदार पद पर रहे एक माननीय इन दिनों धार्मिक आयोजनों के सहारे अपने पुनर्वास की कोशिश में जुटे हैं। सरकार में महत्वपूर्ण पद पर नंबर 2 की भूमिका में रहे माननीय ने कुछ दिन पहले एक बड़ा धार्मिक आयोजन कराया था और उन्हें उम्मीद है कि इस आयोजन के बाद मोहन मंत्रिमंडल में अपना स्थान बना पाएंगे। देखना यह है कि मध्य प्रदेश में, क्योंकि उनके क्षेत्र से उनके जिले से पहले ही एक मंत्री है और दो-तीन दिग्गज पहले से लाइन में हैं, तो क्या इनका नंबर लग पाएगा। यदि उनके जिले से किसी और को मंत्री बनाने की बात आई, तो इस बार नए चेहरे को प्राथमिकता मिलने की संभावना है। लेकिन धार्मिक आयोजन के बाद ऊपर से नीचे तक पुनर्वास के प्रयास जारी हैं।
3= अब दिल्ली में रंग जमाने की कोशिश,,,,
मध्य प्रदेश के एक ताकतवर नेता, जो शिवराज मंत्रिमंडल में पहले ग्वालियर-चंबल संभाग का प्रतिनिधित्व करते थे और लंबे समय तक महत्वपूर्ण जिम्मेदारी का निर्वाह किया था, फिलहाल विधायक के रूप में सदन में नहीं आ पाए। लेकिन दिल्ली में उनकी पकड़ अच्छी मानी जाती है। उन्हें उम्मीद है कि वे दिल्ली में अपना वजन बढ़ाकर राष्ट्रीय स्तर पर संगठन में किसी पद पर सक्रिय होंगे। परंतु दिल्ली अभी दूर है, क्योंकि मध्य प्रदेश से दिल्ली की टीम में शामिल होने वालों की लंबी कतार है। मोहन मंत्रिमंडल में कई दिग्गजों को स्थान नहीं मिला है, लेकिन राष्ट्रीय अध्यक्ष की टीम में इन लोगों को स्थान मिलेगा या नहीं, यह अभी तय नहीं है। इस बार युवा चेहरों को अवसर मिलने की संभावनाएं अधिक हैं। फिर भी दिल्ली में रंग जमाने के लिए ग्वालियर-चंबल संभाग के यह नेता पूरी ताकत लगा रहे हैं।
4= फिर मौका मिलेगा या पूर्व लगेगा,,,,
मध्य प्रदेश से राज्यसभा में दो सदस्य रिटायर हो रहे थे—एक भाजपा से और एक कांग्रेस से। समर सिंह सोलंकी, जो भाजपा से आदिवासी चेहरा हैं, और दिग्विजय सिंह, जो कांग्रेस के राष्ट्रीय स्तर के नेता एवं पूर्व मुख्यमंत्री हैं, दोनों का कार्यकाल समाप्त हो रहा है। दोनों फिर से राज्यसभा में जाएंगे या नहीं, इस पर कार्यकर्ता नजर लगाए हुए हैं। नए लोग भी कोशिश कर रहे हैं कि उन्हें मौका मिलना चाहिए। लेकिन मौका मिलेगा या नहीं, यह समय बताएगा। एक नेताजी ने बड़े मंच से स्पष्ट कर दिया है कि वह राज्यसभा में नहीं जाना चाहते। यह कहकर उन्होंने अपने विरोध के रास्ते पहले से बंद कर लिए। वहीं भाजपा के वर्तमान माननीय की जगह पार्टी किसे मौका देती है, यह भी देखना होगा, क्योंकि कई ऐसे नेता हैं जो उच्च सदन में बेहतर प्रदर्शन कर सकते हैं और राष्ट्रीय स्तर पर पार्टी के लिए उपयोगी साबित हो सकते हैं। देखना होगा कि किसके नाम के आगे ‘पूर्व’ लगेगा।
5= आपा खोया, साहब ने संभाला,,,,
सदन में भागीरथपुरा में हुई घटना को लेकर जबरदस्त गर्मी रही। इस्तीफा, नैतिकता और जिम्मेदारी को लेकर सत्ताधारी दल और विपक्ष के बीच जमकर आरोप-प्रत्यारोप का दौर चला। सत्ताधारी दल के एक माननीय ने आपा खो दिया और औकात पर आ गए। दीपक पर भी ऐसे ही आरोप लगे। लेकिन भला हो प्रदेश के मुखिया का—शालीनता और गरिमा के साथ बड़े विनम्र भाव से सदन में हुए दुर्भाग्यपूर्ण घटनाक्रम पर उन्होंने माफी मांगकर पूरा मामला शांत कर दिया। इससे पहले भी एक ऐसे ही मामले में लंबे समय तक सदन में हंगामा हुआ था। इस बार बड़े साहब ने विपक्ष के हाथ में मुद्दा जाने से पहले ही उसे खत्म कर दिया।
6= साहब की निष्क्रियता चर्चा का विषय बनी,,,,
सत्ता के शीर्ष के नंबर 2 पद पर बैठे एक साहब की इन दिनों छुट्टी और निष्क्रियता चर्चा का विषय बनी हुई है। साहब उसी क्षेत्र से आते हैं और कुछ दिन पहले अपने क्षेत्र में बड़ा धार्मिक आयोजन कराया था। लेकिन सदन में उनके विभाग को लेकर कई मामले और संभावित अभियानों को देखते हुए वह पूरी तरह निष्क्रिय नजर आए। कारण स्पष्ट था—साहब अपना बचाव या ऐसी कोई बात नहीं करना चाहते थे जिससे वह टारगेट पर आएं। बजट सत्र के शुरुआती दौर में साहब की चुप्पी और निष्क्रियता पूरे सदन में चर्चा का विषय बनी रही।