गांधीनगर, 20 फरवरी।
गुजरात उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण फैसले में राज्य के होमगार्ड जवानों को पुलिस कर्मचारियों के समान वेतन और अन्य सुविधाएं देने की मांग वाली कई रिट याचिकाएं खारिज कर दी हैं। अदालत ने साफ कहा कि होमगार्ड की सेवा ‘मानद सेवा’ है, इसलिए उन्हें नियमित सरकारी कर्मचारियों की तरह वेतन-भत्ते नहीं दिए जा सकते।
जस्टिस मौलिक जे. शेलत ने अपने निर्णय में कहा कि होमगार्ड जवानों की सेवा स्वैच्छिक और मानद प्रकृति की है। उनकी तुलना पुलिस कर्मियों से नहीं की जा सकती। अदालत ने स्पष्ट किया कि होमगार्ड और पुलिस के कार्य, जिम्मेदारियां और सेवा शर्तें अलग-अलग हैं। ऐसे में “समान काम के लिए समान वेतन” का सिद्धांत इस मामले में लागू नहीं होता।
अदालत ने यह भी कहा कि Bombay Home Guard Act, 1947 के तहत होमगार्ड एक स्वैच्छिक संगठन है और उनकी सेवाएं स्थायी नहीं मानी जातीं। न्यायालय ने होमगार्ड जवानों को बॉर्डर विंग होमगार्ड के समान लाभ देने से भी इनकार कर दिया।
राज्य सरकार ने भी याचिकाओं का विरोध करते हुए कहा कि पुलिस कर्मियों की नियुक्ति एक नियमित और कानूनी प्रक्रिया से होती है, जबकि होमगार्ड की भूमिका अलग है। पुलिस के काम के घंटे, जिम्मेदारियां और सेवा शर्तें भी भिन्न हैं। होमगार्ड की स्थापना आपात स्थिति में सहयोग देने के उद्देश्य से की गई थी।
हालांकि याचिकाएं खारिज कर दी गईं, लेकिन अदालत ने मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए राज्य सरकार को सुझाव दिया कि होमगार्ड जवानों के मौजूदा भत्तों में सुधार पर विचार किया जाए, ताकि उनकी सेवाओं के अनुरूप उन्हें उचित पारिश्रमिक मिल सके।



