मध्य-पूर्व एक बार फिर विस्फोटक मोड़ पर खड़ा है। अयातुल्लाह अली खामेनेई की कथित मृत्यु के बाद ईरान में सत्ता-संतुलन, क्षेत्रीय राजनीति और वैश्विक कूटनीति को लेकर गहरी अनिश्चितता पैदा हो गई है। बगदाद में अमेरिकी दूतावास के बाहर प्रदर्शन, भारत के लखनऊ और जम्मू-कश्मीर सहित कई शहरों में विरोध, और स्वयं ईरान की सड़कों पर लाखों लोगों का उतरना—ये संकेत हैं कि यह घटना केवल एक देश की नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र की स्थिरता से जुड़ी है।
ईरान एक इस्लामी गणराज्य है, जहां सर्वोच्च नेता का पद धार्मिक और राजनीतिक दोनों अधिकारों का केंद्र है। खामेनेई के बाद उत्तराधिकार का निर्णय ‘असेंबली ऑफ एक्सपर्ट्स’ करती है। ऐसे में तत्काल राजतंत्र की वापसी—जैसी 1979 की इस्लामी क्रांति से पहले मोहम्मद रजा पहलवी के दौर में थी—व्यावहारिक रूप से कठिन प्रतीत होती है। चार दशक से अधिक समय में ईरान की संस्थाएं, सुरक्षा ढांचा और वैचारिक संरचना इस्लामी गणराज्य के अनुरूप ढल चुकी हैं।
हालांकि नेतृत्व का शून्य आंतरिक गुटबाजी को जन्म दे सकता है। कट्टरपंथी और अपेक्षाकृत उदार धड़ों के बीच संघर्ष तेज हो सकता है। इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (आईआरजीसी) की भूमिका निर्णायक रहेगी, क्योंकि वह केवल सैन्य शक्ति ही नहीं, बल्कि आर्थिक और राजनीतिक प्रभाव भी रखता है। यदि सत्ता-परिवर्तन सुचारु रहा तो ईरान अपनी परंपरागत नीति पर कायम रह सकता है, किंतु लंबा संक्रमण काल क्षेत्रीय अस्थिरता को बढ़ा सकता है।
ईरान ने अतीत में प्रत्यक्ष और परोक्ष दोनों तरीकों से जवाबी कार्रवाई की है। कासिम सुलेमानी की 2020 में हत्या के बाद तेहरान ने मिसाइल हमलों के जरिए संदेश दिया था। यदि मौजूदा स्थिति और गंभीर होती है, तो प्रत्यक्ष सैन्य टकराव का जोखिम बढ़ सकता है, विशेषकर इज़राइल और संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ। हालांकि पूर्ण युद्ध सभी पक्षों के लिए महंगा होगा। ईरान की अर्थव्यवस्था पहले से प्रतिबंधों के दबाव में है, वहीं अमेरिका और इज़राइल भी व्यापक क्षेत्रीय युद्ध से बचना चाहेंगे। अधिक संभावना ‘प्रॉक्सी’ मोर्चों—इराक, सीरिया, लेबनान या यमन—में तनाव बढ़ने की है। ऐसे परिदृश्य में खाड़ी क्षेत्र के हवाई अड्डे और समुद्री मार्ग असुरक्षित हो सकते हैं।
कुछ विश्लेषणों में क्षेत्र में नए धार्मिक-राजनीतिक नेतृत्व की चर्चा हो रही है, किंतु “मुस्लिम देशों के खलीफा” जैसी अवधारणा आज की अंतरराष्ट्रीय राजनीति में अधिक प्रतीकात्मक है। ऑर्गेनाइजेशन ऑफ इस्लामिक कोऑपरेशन जैसे मंच सहयोग तो प्रदान करते हैं, पर किसी एक केंद्रीकृत नेतृत्व की स्थापना व्यावहारिक नहीं दिखती। सुन्नी-शिया विभाजन, राष्ट्रीय हित और क्षेत्रीय प्रतिस्पर्धाएं ऐसी किसी संरचना को असंभव बनाती हैं।
मध्य-पूर्व में चीन की आर्थिक मौजूदगी—विशेषकर ऊर्जा आयात और बुनियादी ढांचा निवेश—महत्वपूर्ण है। यदि ईरान में अस्थिरता बढ़ती है तो चीन की रणनीतिक गणनाएं प्रभावित होंगी। रूस भी ईरान को पश्चिमी दबाव के संतुलन के रूप में देखता रहा है। इसलिए यह संकट केवल क्षेत्रीय नहीं, बल्कि वैश्विक शक्ति-संतुलन से भी जुड़ा है।
भारत के लिए सबसे बड़ी प्राथमिकता अपने नागरिकों की सुरक्षा है। लाखों भारतीय खाड़ी और पश्चिम एशिया में कार्यरत हैं—इराक, ईरान, यूएई और अन्य देशों में। किसी भी सैन्य टकराव की स्थिति में हवाई क्षेत्र बंद होना, समुद्री मार्ग बाधित होना और दूतावासों पर दबाव बढ़ना स्वाभाविक है। भारत को 1990 के कुवैत संकट और 2015 के यमन संकट से सबक लेकर त्वरित निकासी की तैयारी रखनी होगी।
भारतीय विदेश मंत्रालय को स्थानीय मिशनों के साथ समन्वय बढ़ाकर हेल्पलाइन, सुरक्षित कॉरिडोर और विशेष उड़ानों की योजना सक्रिय रखनी चाहिए। साथ ही नई दिल्ली को संतुलित कूटनीति अपनानी होगी। ईरान के साथ पारंपरिक संबंध और अमेरिका-इज़राइल के साथ रणनीतिक साझेदारी—दोनों भारत के हित में हैं।
ईरान के सर्वोच्च नेता की मृत्यु केवल एक राजनीतिक घटना नहीं, बल्कि संभावित वैचारिक और रणनीतिक परिवर्तन का संकेत हो सकती है। राजतंत्र की वापसी की संभावना सीमित है; अधिक यथार्थवादी परिदृश्य यह है कि इस्लामी गणराज्य की संरचना के भीतर ही नया नेतृत्व उभरे। परंतु संक्रमण काल जितना लंबा होगा, उतना ही अस्थिरता का जोखिम बढ़ेगा।
विश्व समुदाय के लिए यह समय उकसावे की राजनीति से बचने और संवाद के रास्ते खोलने का है। भारत के लिए प्राथमिकता स्पष्ट है—अपने नागरिकों की सुरक्षा, ऊर्जा आपूर्ति की स्थिरता और संतुलित कूटनीति। यदि संयम और विवेक से कदम उठाए गए, तो यह संकट व्यापक युद्ध में बदलने से रोका जा सकता है; अन्यथा मध्य-पूर्व की आग पूरी दुनिया को झुलसा सकती है।