लाहौर, 09 फरवरी।
प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के सलाहकार और पूर्व गृहमंत्री राणा सनाउल्लाह को बलोचिस्तान में जबरन गायब किए जा रहे लोगों पर विवादित टिप्पणी के कारण जमकर खरी-खोटी सुननी पड़ी। दो दिवसीय छठवें अंतरराष्ट्रीय अस्मा जहांगीर सम्मेलन में इस टिप्पणी पर एक महिला ने कहा कि राणा सनाउल्लाह 'तुम तो चुप ही रहो'। बलोचिस्तान से आए प्रतिनिधियों ने राणा की टिप्पणी पर विरोध जताया और सम्मेलन का बहिष्कार किया।
द ब्लोचिस्तान पोस्ट के अनुसार, यह दक्षिण एशिया का सबसे बड़ा मानवाधिकार सम्मेलन माना जाता है। अस्मा जहांगीर सम्मेलन का समापन स्थानीय फलेटी होटल में आठ फरवरी को हुआ। प्रधानमंत्री के सलाहकार राणा की टिप्पणी से माहौल तनावपूर्ण हो गया। राणा ने बलोचिस्तान में लापता व्यक्तियों को बीएलए का समर्थक बताया और कहा कि उनके मानवाधिकारों के उल्लंघन पर कार्रवाई जरूरी है। उन्होंने चेतावनी दी कि आतंकवाद जारी रहेगा तो जबरन गायब किया जाएगा।
सम्मेलन में उपस्थित लोगों ने कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की और राणा से हॉल छोड़ने की मांग की। उन्होंने विरोध के बावजूद रुख नहीं बदला। इस पर प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता शिमा किरमानी, बलोच सॉलिडेरिटी कमेटी के नेता और सामी दीन बलूच सहित आधे से ज्यादा वक्ता हॉल छोड़कर चले गए। अस्मा जहांगीर की भतीजी ने कहा कि राणा जैसे लोगों को बुलाया नहीं जाना चाहिए।
प्रतिभागियों ने कहा कि मानवाधिकार सम्मेलन में जबरन गायब किए जाने की अनुमति अस्वीकार्य है। यह पीड़ित परिवारों के घावों पर नमक छिड़कने के बराबर है और अस्मा जहांगीर के विचारों का अपमान है। बीएनपी अध्यक्ष और बलोचिस्तान के पूर्व मुख्यमंत्री सरदार अख्तर मेंगल ने राणा को जवाब दिया और बलोचिस्तान में लोगों की वास्तविक स्थिति बयान की।
उन्होंने बताया कि जब सेना आती है, तो लोग घरों में बंद हो जाते हैं, लेकिन जब लड़ाके शहरों में आते हैं तो लोग उनके साथ सेल्फी लेते हैं। राणा और अन्य को ये बातें दिखाई नहीं देतीं। उन्होंने कलात के खान और जिन्ना के बीच हुए समझौते और बलोचिस्तान के हालात का भी जिक्र किया।
बीएनपी प्रमुख ने राणा के बयान का जिक्र किया कि बातचीत तब हो सकती है जब अख्तर मेंगल सशस्त्र जिम्मेदारी लें। उन्होंने कहा कि बलोचिस्तान में पहले ही कई लोगों ने जिम्मेदारी ली, पर उन्हें दंड नहीं मिला। उन्होंने कहा कि कुछ लोग लड़ाकों को आतंकवादी कहते हैं, लेकिन सार्वजनिक रूप से लोग उन्हें रक्षक मानते हैं।
इस बार अस्मा जहांगीर सम्मेलन का विषय "मौलिक अधिकारों का क्षरण और सीमाओं के पार प्रतिरोध" था। इसका आयोजन अस्मा जहांगीर लीगल एड सेल ने उच्चतम न्यायालय बार एसोसिएशन और पाकिस्तान बार काउंसिल के सहयोग से किया। इसमें न्यायाधीशों, वकीलों, पत्रकारों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और संयुक्त राष्ट्र प्रतिनिधियों सहित 120 से अधिक वक्ताओं ने भाग लिया। संवैधानिक संशोधन, दक्षिण एशिया में शत्रुता, अफगान शरणार्थियों की वापसी, कश्मीर, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और अल्पसंख्यकों की स्थिति जैसे विषयों पर 18 सत्र आयोजित किए गए।



