मध्य-पूर्व में ईरान, इजराइल और अमेरिका के टकराव ने सुरक्षा परिषद की सीमाओं को उजागर किया। वैश्विक शांति के लिए सुधार और न्यायपूर्ण अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था आवश्यक है।
डॉ. शैलेश शुक्ला
मध्य-पूर्व एक बार फिर बड़े सैन्य तनाव के दौर से गुजर रहा है। ईरान, इजराइल और अमेरिका के बीच बढ़ते टकराव ने पूरे क्षेत्र को अस्थिर बना दिया है। तेहरान पर अमेरिकी और इजराइली हमलों के बाद ईरान ने जवाबी कार्रवाई करते हुए इजराइल तथा खाड़ी क्षेत्र के कई देशों पर मिसाइलें और ड्रोन दागे। इस स्थिति ने पूरे अंतरराष्ट्रीय समुदाय की चिंता बढ़ा दी है। ऐसे समय में दुनिया की निगाहें स्वाभाविक रूप से संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की ओर उठती हैं, क्योंकि वैश्विक शांति और सुरक्षा बनाए रखने की जिम्मेदारी इसी संस्था पर है। किंतु हाल की घटनाओं ने यह प्रश्न फिर से सामने ला दिया है कि क्या संयुक्त राष्ट्र वास्तव में युद्धों को रोकने में प्रभावी भूमिका निभा पा रहा है।
फरवरी 2026 के अंत में अमेरिका और इजराइल ने ईरान के खिलाफ एक बड़े सैन्य अभियान की शुरुआत की। इस अभियान में ईरान की परमाणु सुविधाओं, बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम और इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स के ठिकानों को निशाना बनाया गया। इन हमलों के बाद पूरे क्षेत्र में तनाव तेजी से बढ़ गया। ईरान ने जवाबी कार्रवाई करते हुए इजराइल के साथ-साथ उन खाड़ी देशों पर भी हमले किए जहां अमेरिकी सैन्य अड्डे मौजूद हैं। बहरीन के तेल शोधन संयंत्र पर हमला और अन्य घटनाओं ने इस संकट को और गंभीर बना दिया। इन हमलों में नागरिकों की मौत की खबरें भी सामने आईं, जिनमें स्कूलों और अन्य नागरिक ढांचों को नुकसान पहुंचने की घटनाएं शामिल हैं।
इस स्थिति के बाद संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की आपात बैठक बुलाई गई। संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुतेरेस ने स्पष्ट कहा कि किसी भी देश द्वारा दूसरे देश की क्षेत्रीय अखंडता के खिलाफ बल प्रयोग अंतरराष्ट्रीय कानून के विरुद्ध है और इससे वैश्विक शांति को गंभीर खतरा उत्पन्न होता है। लेकिन इन चेतावनियों का वास्तविक घटनाओं पर कोई विशेष प्रभाव दिखाई नहीं दिया। हमले जारी रहे और संघर्ष और अधिक गहराता गया। इससे यह धारणा मजबूत होती है कि जब बड़े और शक्तिशाली देश किसी संघर्ष में सीधे शामिल हो जाते हैं, तब संयुक्त राष्ट्र की प्रभावशीलता सीमित हो जाती है।
संयुक्त राष्ट्र की इस स्थिति के पीछे उसकी संरचना भी एक बड़ा कारण है। सुरक्षा परिषद में अमेरिका, रूस, चीन, ब्रिटेन और फ्रांस पांच स्थायी सदस्य हैं और इनके पास वीटो की शक्ति है। इसका अर्थ यह है कि इन देशों में से कोई भी किसी प्रस्ताव को रोक सकता है। जब किसी संघर्ष में इन देशों में से कोई स्वयं पक्ष बन जाता है, तब सुरक्षा परिषद की प्रभावी कार्रवाई लगभग असंभव हो जाती है। ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई के मामले में भी यही स्थिति देखने को मिली। अमेरिका स्वयं इस कार्रवाई का हिस्सा था, इसलिए उसके खिलाफ कोई कठोर प्रस्ताव पारित होना संभव नहीं था। परिणामस्वरूप परिषद में चर्चा तो हुई, लेकिन कोई ठोस कदम सामने नहीं आया।
यह स्थिति नई नहीं है। इससे पहले रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान भी संयुक्त राष्ट्र इसी प्रकार की असहायता का प्रदर्शन कर चुका है। रूस के खिलाफ प्रस्ताव बार-बार उसके वीटो के कारण रुकते रहे। इसी प्रकार गाजा संघर्ष और अन्य कई अंतरराष्ट्रीय संकटों में भी वीटो की राजनीति ने संयुक्त राष्ट्र को प्रभावी कदम उठाने से रोका है। इस कारण कई विश्लेषकों का मानना है कि संयुक्त राष्ट्र वैश्विक शांति बनाए रखने के अपने मूल उद्देश्य को पूरी तरह हासिल नहीं कर पा रहा है।
ईरान संकट के दौरान अंतरराष्ट्रीय कानून की व्याख्या को लेकर भी विवाद सामने आया। अमेरिका ने अपने हमलों को संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद 51 के तहत आत्मरक्षा का अधिकार बताते हुए उचित ठहराया। दूसरी ओर ईरान और कई अन्य देशों ने इसे संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद 2 का उल्लंघन बताया, जिसमें बल प्रयोग पर प्रतिबंध की बात कही गई है। यह स्थिति दर्शाती है कि अंतरराष्ट्रीय कानून की व्याख्या अक्सर शक्तिशाली देशों के हितों के अनुसार की जाती है। जब ताकतवर देश ही नियमों की अलग-अलग व्याख्या करने लगते हैं, तब किसी निष्पक्ष वैश्विक व्यवस्था की संभावना कमजोर पड़ जाती है।
मध्य-पूर्व का यह संकट केवल सैन्य संघर्ष तक सीमित नहीं है। इसका प्रभाव वैश्विक अर्थव्यवस्था और ऊर्जा सुरक्षा पर भी पड़ रहा है। होर्मुज जलसंधि के आसपास तनाव बढ़ने से तेल आपूर्ति प्रभावित होने की आशंका पैदा हो गई है। दुनिया के लगभग 20 प्रतिशत कच्चे तेल का परिवहन इसी मार्ग से होता है। ऐसे में तेल की कीमतों में तेजी से वृद्धि होने लगी है। इसके बावजूद संयुक्त राष्ट्र इस संकट को नियंत्रित करने में प्रभावी भूमिका निभाने में असमर्थ दिखाई देता है।
इतिहास में भी कई ऐसे अवसर आए हैं जब संयुक्त राष्ट्र बड़े मानवीय संकटों को रोकने में विफल रहा। 1994 के रवांडा नरसंहार के दौरान लाखों लोगों की हत्या हुई, लेकिन उस समय संयुक्त राष्ट्र की निष्क्रियता की तीखी आलोचना हुई थी। इसी प्रकार सीरिया के गृहयुद्ध, यूक्रेन संकट और गाजा संघर्ष जैसे मामलों में भी संयुक्त राष्ट्र की भूमिका सीमित ही रही। इससे यह धारणा मजबूत होती गई कि जब बड़े देशों के हित टकराते हैं, तब संयुक्त राष्ट्र प्रभावी कार्रवाई नहीं कर पाता।
फिर भी यह कहना पूरी तरह सही नहीं होगा कि संयुक्त राष्ट्र पूरी तरह अप्रासंगिक हो चुका है। वैश्विक स्तर पर कई ऐसे क्षेत्र हैं जहां यह संस्था आज भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। विश्व खाद्य कार्यक्रम भूख से जूझ रहे देशों में राहत पहुंचाता है। यूनिसेफ बच्चों के स्वास्थ्य और शिक्षा के लिए काम करता है। शरणार्थियों की सहायता के लिए संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी उच्चायुक्त की संस्था सक्रिय है। विश्व स्वास्थ्य संगठन वैश्विक महामारी और स्वास्थ्य संकटों से निपटने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। जलवायु परिवर्तन, मानवाधिकार और विकास कार्यक्रमों जैसे क्षेत्रों में भी संयुक्त राष्ट्र का योगदान महत्वपूर्ण है।
संयुक्त राष्ट्र की स्थापना 1945 में द्वितीय विश्व युद्ध के बाद इस उद्देश्य से की गई थी कि आने वाली पीढ़ियों को युद्ध की भयावहता से बचाया जा सके। उस समय 51 देशों ने मिलकर इस संस्था की नींव रखी थी। आज इसके सदस्य देशों की संख्या 193 तक पहुंच चुकी है। लेकिन जैसे-जैसे विश्व व्यवस्था अधिक जटिल होती गई, संयुक्त राष्ट्र की निर्णय प्रक्रिया भी कठिन होती गई। शीत युद्ध के दौरान अमेरिका और सोवियत संघ की प्रतिद्वंद्विता ने संयुक्त राष्ट्र को कई बार निष्क्रिय बना दिया। शीत युद्ध के बाद कुछ समय के लिए उम्मीद जगी कि यह संस्था अधिक प्रभावी हो सकेगी, लेकिन बाद के कई संघर्षों ने उस आशा को कमजोर कर दिया।
इसी कारण पिछले कई दशकों से संयुक्त राष्ट्र में सुधार की मांग उठती रही है। कई देश सुरक्षा परिषद की संरचना में बदलाव और स्थायी सदस्यता के विस्तार की मांग करते हैं। भारत, ब्राजील, जर्मनी और जापान जैसे देशों का तर्क है कि वर्तमान सुरक्षा परिषद 1945 की शक्ति संरचना को दर्शाती है, जबकि आज की दुनिया बदल चुकी है। इसी तरह वीटो प्रणाली को सीमित करने या समाप्त करने का प्रस्ताव भी कई बार सामने आया है। लेकिन जिन देशों के पास वीटो की शक्ति है, वे इसे छोड़ने के लिए तैयार नहीं हैं।
आज की दुनिया के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि संयुक्त राष्ट्र को 21वीं सदी की वास्तविकताओं के अनुरूप कैसे बनाया जाए। जब तक सुरक्षा परिषद की संरचना अधिक प्रतिनिधिक और लोकतांत्रिक नहीं बनती, जब तक वीटो की शक्ति सीमित नहीं होती और जब तक अंतरराष्ट्रीय कानून को लागू करने का प्रभावी तंत्र विकसित नहीं होता, तब तक संयुक्त राष्ट्र की भूमिका अधूरी ही बनी रहेगी।
मध्य-पूर्व का वर्तमान संकट एक बार फिर यह याद दिलाता है कि वैश्विक शांति केवल घोषणाओं और बैठकों से स्थापित नहीं हो सकती। इसके लिए ऐसी अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की आवश्यकता है जिसमें शक्ति के साथ-साथ न्याय और समानता का संतुलन भी मौजूद हो। संयुक्त राष्ट्र यदि स्वयं को इस दिशा में बदल पाता है तो भविष्य में फिर से अधिक प्रभावी भूमिका निभा सकता है।