काठमांडू, 11 मार्च।
पांच मार्च को हुए संसदीय चुनाव में राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी ने अभूतपूर्व सफलता हासिल की और दो तिहाई बहुमत के साथ सरकार बनाने जा रही है, जबकि लंबे समय तक सत्ता पर काबिज वामपंथी दलों के लिए दहाई का आंकड़ा पार करना भी मुश्किल हो गया है।
प्रत्यक्ष मत परिणाम के अनुसार नेपाल के प्रमुख वामपंथी दल को १० सीट भी नहीं मिली हैं। पूर्व प्रधानमंत्री पी शर्मा ओली के नेतृत्व वाली सीपीएन यूएमएल को केवल ९ सीटें मिलीं, जबकि पूर्व प्रधानमंत्री पुष्कमल दहाल प्रचंड के नेतृत्व वाली नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी को ७ सीटें ही मिली।
पूर्व प्रधानमंत्री डा बाबूराम भट्टराई के नेतृत्व वाली प्रगतिशील लोकतांत्रिक पार्टी को एक भी सीट नहीं मिली और माओवादी सहित अन्य छोटे वामपंथी दलों का सूपड़ा साफ हो गया। भारत के विरोध में राष्ट्रवाद की राजनीति करने वाले वामपंथी दलों को जनता ने इस बार पूरी तरह खारिज कर दिया।
1990 के जन आंदोलन के बाद दशकों तक नेपाल में राजनीति पर प्रभाव बनाए रखने वाले कम्युनिस्ट दल अब अभूतपूर्व अस्तित्व संकट का सामना कर रहे हैं। विशेषज्ञों के अनुसार इसका मुख्य कारण नेतृत्व में विवाद और अस्थिर नीतियां हैं, जिससे आने वाले वर्षों में इनका प्रभाव और घट सकता है।
ऐतिहासिक रूप से नेपाल में कम्युनिस्ट दलों की स्थिति उतार-चढ़ाव भरी रही है। 1959 में पहले आम चुनाव में कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल को 109 सीटों में से केवल 4 सीटें मिली थीं, जबकि नेपाली कांग्रेस ने 74 सीटें जीतकर दो-तिहाई बहुमत हासिल किया। पंचायत व्यवस्था समाप्त होने के बाद कम्युनिस्ट गुट धीरे-धीरे नेपाली कांग्रेस के प्रमुख प्रतिद्वंद्वी बन गए।
1991 के चुनाव में सीपीएन-यूएमएल ने 205 सीटों में से 69, यूनाइटेड पीपुल्स फ्रंट ने 9 और नेपाल वर्कर्स एंड पीजेंट्स पार्टी ने 2 सीटें जीतीं। 1994 में यूएमएल ने 88 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बनी, जबकि वर्कर्स एंड पीजेंट्स पार्टी को 4 सीटें मिलीं। 1999 में अंतिम चुनाव में यूएमएल ने 71, राष्ट्रीय जनमोर्चा को 5 और वर्कर्स एंड पीजेंट्स पार्टी को 1 सीट मिली।
माओवादी विद्रोह और 2006 के 19-दिवसीय जनआंदोलन के बाद 2008 में संविधान सभा चुनाव में सीपीएन (माओवादी) ने 601 में से 220 सीटें जीतकर चरम सफलता पाई। यूएमएल को 103, सीपीएन (एमएल) को 8 और अन्य दलों को सीमित सीटें मिलीं।
बाद के वर्षों में कम्युनिस्ट गुटों के बीच विभाजन और आंतरिक संघर्ष ने उनकी चुनावी ताकत कमजोर की। 2013 के संविधान सभा चुनाव में माओवादी की सीटें घटकर 80, यूएमएल 175 और अन्य छोटे दलों की सीमित सीटें ही बची।
2017 में प्रमुख कम्युनिस्ट दलों के लेफ्ट एलायंस में एकजुट होने से संसदीय बहुमत मिला, जो 2022 तक जारी रहा। लेकिन फाल्गुन 21 के ताजा चुनाव में छोटे कम्युनिस्ट दल लगभग समाप्त हो गए और केवल यूएमएल और नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी की सीमित उपस्थिति बची।
शहरी मतदाताओं ने स्पष्ट रूप से कम्युनिस्ट दलों को खारिज किया। विश्लेषक मानते हैं कि यह स्थिति 1950 के शुरुआती दशक जैसी हो सकती है और यदि दलों ने सुधार नहीं किया, तो नेपाली राजनीति में उनकी भूमिका और सीमित हो सकती है।
यूएमएल और प्रचंड के नेतृत्व में बदलाव के संकेत नहीं दिख रहे। यद्यपि नेतृत्व परिवर्तन को लेकर बहस उठी, लेकिन दोनों नेताओं ने कोई संकेत नहीं दिया। अन्य पारंपरिक कम्युनिस्ट दलों में भी आधुनिकीकरण या सुधार के संकेत नहीं हैं।
ताजा चुनाव परिणाम बताते हैं कि जनता ने पारंपरिक कम्युनिस्ट राजनीति और नेतृत्व शैली को नकार दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि नई सरकार सुशासन और विकास का प्रभावी उपयोग करती है, तो कम्युनिस्ट दलों का ऐतिहासिक प्रभाव धीरे-धीरे हाशिये तक सीमित हो सकता है।



