काठमांडू, 09 मार्च 2026।
नेपाल में प्रतिनिधि सभा चुनाव के तहत अब तक घोषित 160 निर्वाचन क्षेत्रों के परिणामों के अनुसार नई संसद में 40 वर्ष से कम उम्र के सांसदों की संख्या 60 तक पहुँच गई है। हालांकि, 110 समानुपातिक सांसदों में भी कई युवा सांसदों के आने की संभावना है।
नेपाल की कुल आबादी में 16 से 40 वर्ष आयु वर्ग की हिस्सेदारी लगभग 40.35 प्रतिशत है। वर्ष 2022 के प्रतिनिधि सभा चुनाव में 165 निर्वाचन क्षेत्रों में से केवल 10 युवा उम्मीदवार ही जीत पाए थे। उस समय 70 वर्ष से अधिक आयु के 14 सांसद निर्वाचित हुए थे, जबकि 40 से 70 वर्ष आयु वर्ग के सांसदों की संख्या सबसे अधिक (138) थी।
इस बार के चुनाव परिणामों ने संसद की उम्र संरचना में बड़ा परिवर्तन दिखाया है। अब तक घोषित परिणामों के अनुसार 40 वर्ष से कम उम्र के 60 उम्मीदवार प्रतिनिधि सभा में चुने जा चुके हैं। इस वर्ग में राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (आरएसपी) का वर्चस्व स्पष्ट है। 60 में से 52 सांसद आरएसपी से निर्वाचित हुए हैं, जबकि नेपाली कांग्रेस से 4, सीपीएन यूएमएल से 2 और राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी तथा श्रम संस्कृति पार्टी से एक–एक सांसद चुनकर आए हैं।
25 वर्षीय प्रशांत उप्रेती मकवानपुर–2 से सबसे युवा सांसद बने हैं। इसके अलावा पूर्वी नवलपरासी–2 से 26 वर्षीय मनीष खनाल, कैलाली–2 से 26 वर्षीय केपी खनाल, रूपन्देही–2 से 28 वर्षीय सुलभ खरेल, सिरहा–1 से 28 वर्षीय बब्लु गुप्ता और झापा–1 से 29 वर्षीय निशा डांगी भी संसद में आरएसपी से पहुंचे हैं।
काठमांडू–5 से 29 वर्षीय सस्मित पोखरेल, काठमांडू–1 से 30 वर्षीय रन्जु न्यौपाने, सिरहा–2 से 30 वर्षीय शिवशंकर यादव, चितवन–3 से 30 वर्षीय सोबिता गौतम, मोरंग–6 से 31 वर्षीय रुबिना आचार्य और प्युठान–1 से 31 वर्षीय सुशांत वैदिक भी आरएसपी के युवा सांसद हैं।
चुनाव से पहले प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार 36 वर्षीय बालेन्द्र शाह ने झापा–5 से के पी शर्मा ओली को पराजित कर प्रतिनिधि सभा की सीट जीती।
51 से 60 वर्ष आयु वर्ग के 36 उम्मीदवार निर्वाचित हुए हैं, जिनमें से 28 रास्वपा के हैं। नेपाली कांग्रेस के 4 और नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी तथा यूएमएल के दो–दो उम्मीदवार इसी आयु वर्ग में आते हैं। 60 वर्ष से अधिक आयु के केवल 9 सांसद प्रतिनिधि सभा में शामिल हैं।
विश्लेषकों का मानना है कि संसद में युवाओं की बढ़ती भागीदारी उत्साहजनक संकेत है, लेकिन राजनीतिक शक्ति संतुलन न बनने पर इसका प्रभाव सीमित रह सकता है। राजनीतिक विश्लेषक सुचेता प्याकुरेल के अनुसार 1991 में युवा प्रतिनिधित्व 5 प्रतिशत से कम था, जो अब लगभग 12 प्रतिशत तक पहुंच गया है।
युवा राजनीतिक विश्लेषक नवीन तिवारी ने कहा कि सांसदों की उम्र बढ़ने से ज्यादा उनके नेतृत्व की नीयत, ईमानदारी और स्पष्ट दृष्टि महत्वपूर्ण है। उनका कहना है कि युवा नेताओं का चुना जाना सकारात्मक है, लेकिन उम्र ही निर्णायक तत्व नहीं है और असली प्रभाव उनकी सोच और कार्यशैली से आता है।



