काठमांडू, 9 मार्च 2026।
नेपाल के संसदीय चुनाव में राजतंत्र की वापसी की मांग करने वाले दलों को बड़ा झटका लगा है। राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी (आरपीपी) का लगभग पूरी तरह सफाया हो गया और केवल एक उम्मीदवार ही जीत दर्ज कर सका। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजेन्द्र लिंगदेन सहित सभी बड़े नेता चुनाव में पराजित हुए। इस नतीजे के बाद नेपाल की राजनीति में राजतंत्र समर्थकों के भविष्य को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
चुनाव में आरपीपी को अपेक्षित समर्थन नहीं मिला। पार्टी ने देश में राजतंत्र की बहाली को मुख्य मुद्दा बनाया, लेकिन मतदाताओं ने इस एजेंडे को पूरी तरह नकार दिया।
आरपीपी के युवा नेता ज्ञानेन्द्र शाही जुमला संसदीय क्षेत्र से अपनी सीट बचाने में कामयाब रहे। बाकी सभी नेता हार गए, जिनमें पूर्व अध्यक्ष और पूर्व उप प्रधानमंत्री कमल थापा, पूर्व पुलिस प्रमुख और दो बार के सांसद एवं मंत्री ध्रुव बहादुर प्रधान, बीबीसी नेपाली सेवा के प्रमुख रहे रवींद्र मिश्रा, बार-बार मंत्री बने दीपक बहादुर सिंह और पार्टी के अन्य पदाधिकारी शामिल हैं।
चुनाव परिणाम के तुरंत बाद पार्टी के उपाध्यक्ष रविन्द्र मिश्रा ने पार्टी छोड़ने और सक्रिय राजनीति से संन्यास लेने की घोषणा की। काठमांडू के 1 नंबर संसदीय क्षेत्र में रंजू दर्शाना से हार के बाद मिश्रा ने लिखा कि अब वह सक्रिय राजनीति को अलविदा कह रहे हैं।
मिश्रा ने कहा कि देशभर में राजशाही के प्रति अपार श्रद्धा और समर्थन होने के बावजूद राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी की नेतृत्व क्षमता और आपसी विवादों के कारण वोट में परिणत नहीं हो पाया। वह अब दलीय राजनीति से बाहर रहकर इस एजेंडे के पक्ष में अपनी आवाज बुलंद करेंगे।
राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि इस चुनाव परिणाम से स्पष्ट संकेत मिलता है कि नेपाल की बड़ी आबादी अब राजतंत्र की ओर लौटने के पक्ष में नहीं है। 2008 में नेपाल में राजतंत्र का औपचारिक अंत हुआ और देश संघीय लोकतांत्रिक गणराज्य बन गया।
चुनाव परिणाम के बाद पूर्व राजा ज्ञानेन्द्र शाह की सत्ता में वापसी की संभावना और कमजोर हो गई है। छोटे राजनीतिक समूह और संगठनों द्वारा समय-समय पर राजतंत्र की बहाली की मांग उठती रही है, लेकिन चुनावी राजनीति में इसका प्रभाव सीमित होता जा रहा है। आरपीपी के संस्थापक नेता पशुपति शमशेर राणा का कहना है कि जब तक राजतंत्र समर्थक दल व्यापक जनसमर्थन नहीं पाते, तब तक राजतंत्र की वापसी व्यावहारिक राजनीति में मजबूत नहीं बन पाएगी।
राजतंत्र समर्थक दलों के कमजोर प्रदर्शन के पीछे कई कारण बताए जा रहे हैं। पहला, गणतांत्रिक व्यवस्था की स्वीकार्यता; पिछले डेढ़ दशक में नई राजनीतिक व्यवस्था स्थापित हो चुकी है और युवा मतदाता गणतंत्र को भविष्य मानते हैं। दूसरा, नए राजनीतिक चेहरों का उभार; इस बार नए नेताओं और वैकल्पिक राजनीति के दावेदारों को अधिक समर्थन मिला। तीसरा, राजतंत्र का विवादित इतिहास; अंतिम वर्षों की राजनीतिक अस्थिरता और सत्ता संघर्ष की यादें अभी भी मतदाताओं के मन में हैं। चौथा, स्थानीय मुद्दों का प्रभाव; रोजगार, भ्रष्टाचार, विकास और शासन से जुड़े मुद्दों ने चुनाव में ज्यादा असर डाला।
नेपाल के राजनीतिक विश्लेषक सीके लाल का कहना है कि यह चुनाव परिणाम स्पष्ट संदेश देता है कि जनता अब राजतंत्र की बहाली को प्राथमिकता नहीं दे रही है। हालांकि कुछ इलाकों और सीमित लोगों में राजतंत्र समर्थक भावनाएं अभी भी मौजूद हैं, लेकिन राष्ट्रीय राजनीति में इसका प्रभाव लगातार सीमित होता जा रहा है।



