होली के रंगों में मिलावटखोरों द्वारा जहरीले पदार्थ मिलाकर बेचा जा रहा है। प्रशासन और आम लोगों की लापरवाही से बच्चों और नागरिकों की सेहत खतरे में।
होली जैसे पावन पर्व पर जहां खुशियों के रंग उड़ने चाहिए, वहां बाजार में ज़हर उड़ाया जा रहा है। त्योहार आते ही कुछ लालची व्यापारी अपनी तिजोरियां भरने के लिए आम आदमी की सेहत को दांव पर लगा देते हैं। मिठाइयों में मिलावट के बाद अब गुलाल में पत्थर पीसकर बेचा जा रहा है और प्रशासन या तो अनजान बना बैठा है या आंखें मूंदे हुए है।
सच यह है कि असली गुलाल अरारोट, टेलकम पाउडर या मैदे से बनता है। हर्बल गुलाल हल्दी, चुकंदर, पालक, मेहंदी और टेसू (पलाश) के फूलों से तैयार होता है। लेकिन बाजार में जो सस्ता गुलाल धड़ल्ले से बिक रहा है, उसमें डोलोमाइट, मार्बल और दूसरे सफेद पत्थरों का बारीक पाउडर मिलाकर उस पर रंग और खुशबू छिड़क दी जाती है।
7 से 10 रुपये किलो में पत्थर का पाउडर खरीदकर 30–40 रुपये किलो में बेचना—यही है इन मिलावटखोरों का गणित। जहां स्टैंडर्ड गुलाल 400 ग्राम की पैकिंग में 40 रुपये का है, वहीं 10 किलो का कट्टा 80–100 रुपये में बिक रहा है। सवाल है, क्या अरारोट इतना सस्ता हो सकता है? नहीं। यह सीधा-सीधा धोखा है।
यह मिलावटी गुलाल त्वचा और फेफड़ों के लिए बेहद खतरनाक है। आंखों में चला जाए तो सूजन, लालिमा और दृष्टि क्षति तक हो सकती है। सांस के साथ अंदर जाए तो दमा, खांसी और फेफड़ों में जलन हो सकती है। त्वचा पर पड़े तो खुजली, लाल चकत्ते, जलन और एक्जिमा जैसी समस्याएं हो सकती हैं। लंबे समय तक संपर्क में रहने से त्वचा कैंसर का खतरा भी बढ़ सकता है।
नकली रंगों में एस्बेस्टस, सिलिका, मरकरी सल्फेट, कॉपर सल्फेट जैसे जहरीले तत्व मिलाए जा रहे हैं। नीले रंग के लिए प्रुशियन ब्लू, इंडिगो या कोबाल्ट नाइट्रेट; हरे के लिए मेलाकाइट ग्रीन; और चमक के लिए कांच का पाउडर तक मिलाया जा रहा है। यह रंग नहीं, जहर है।
हर साल त्योहार से पहले मिलावट के खिलाफ बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं। छापेमारी की खबरें आती हैं। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि मिलावटी गुलाल खुलेआम 5 से 10 किलो की पैकिंग में बिक रहा है। क्या प्रशासन को नहीं पता कि 10 किलो का “अरारोट वाला गुलाल” 90 रुपये में नहीं बन सकता? क्या स्वास्थ्य विभाग, खाद्य एवं औषधि विभाग और नगर प्रशासन—सबकी जिम्मेदारी खत्म हो जाती है? जब तक कड़ी कार्रवाई नहीं होगी, तब तक आम आदमी की जिंदगी से खिलवाड़ यूं ही चलता रहेगा।
सिर्फ प्रशासन को कोसने से काम नहीं चलेगा। हमें भी सावधान रहना होगा। बहुत सस्ता गुलाल न खरीदें। पैकिंग पर निर्माता और सामग्री की जानकारी देखें। अत्यधिक चमकीले और तीखी गंध वाले रंगों से बचें। संभव हो तो हर्बल या विश्वसनीय ब्रांड का गुलाल लें। बच्चों की त्वचा और आंखों की विशेष सुरक्षा करें। त्योहार खुशियों का हो, अस्पताल का नहीं।
होली रंगों का त्योहार है, रासायनिक जहर का नहीं। कुछ रुपयों की बचत के लिए सेहत दांव पर लगाना मूर्खता है और मुनाफे के लिए जहर बेचना अपराध। प्रशासन अगर सचमुच जिम्मेदार है तो तुरंत सख्त जांच अभियान चलाए, नमूने जब्त करे, मिलावटखोरों पर मुकदमा दर्ज करे और लाइसेंस रद्द करे। और अगर यह नहीं होता, तो समझ लीजिए रंगों के पीछे कोई और रंग भी खेला जा रहा है। इस होली तय कीजिए—रंग खरीदेंगे, जहर नहीं। खुशी मनाएंगे, लापरवाही नहीं।