संपादकीय
10 Mar, 2026

रूस-चीन की छाया : ईरान युद्ध में वैश्विक शतरंज का खेल

ईरान-अमेरिका-इज़राइल संघर्ष में रूस और चीन का बहुआयामी सहयोग, वैश्विक भू-राजनीति और ऊर्जा बाजार पर संभावित प्रभाव।

डॉ. शैलेश शुक्ला-
ईरान-अमेरिका-इज़राइल युद्ध का नौवां दिन न केवल मध्य पूर्व को रक्तरंजित रणक्षेत्र में बदल रहा है, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन को पुनर्परिभाषित करने वाली भू-राजनीतिक शतरंज की नई चालें भी सामने ला रहा है, जहां रूस और चीन की भूमिका सबसे अधिक चर्चा का विषय बनी हुई है। 28 फरवरी 2026 को शुरू हुए इस संघर्ष में, जब अमेरिका और इज़राइल ने ईरान की परमाणु सुविधाओं, तेल भंडार, शोधन संयंत्र और सैन्य ठिकानों पर 3,000 से अधिक हवाई हमले किए हैं, वहीं रूस और चीन ने सतही कूटनीतिक निंदा से आगे बढ़कर हथियार आपूर्ति, गुप्तचर सहयोग और आर्थिक सहायता के माध्यम से ईरान को मजबूती प्रदान की है, हालांकि दोनों ही महाशक्तियां प्रत्यक्ष सैन्य हस्तक्षेप से सावधानीपूर्वक दूरी बनाए हुए हैं। रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने ईरानी सर्वोच्च नेता अली खामेनेई की हत्या को “अंतरराष्ट्रीय कानून का शर्मनाक उल्लंघन” करार दिया, जबकि चीनी विदेश मंत्रालय ने अमेरिका-इज़राइल गठबंधन को “क्षेत्रीय संप्रभुता का घोर उल्लंघन” बताया। यह संपादकीय रूस और चीन की बहुआयामी भूमिका का गहन विश्लेषण प्रस्तुत करता है, जिसमें उनकी रणनीतिक प्रेरणाएं, व्यावहारिक सहायता, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में रुख, साथ ही इस युद्ध से उन्हें होने वाले संभावित फायदे और नुकसान का विस्तृत मूल्यांकन शामिल है। वास्तव में, यह युद्ध रूस-चीन गठजोड़ के लिए अवसर और संकट दोनों का रूप ले चुका है, जो वैश्विक बहुपक्षीय व्यवस्था को मजबूत करने या तीसरे विश्व युद्ध की ओर धकेलने का निर्णायक मोड़ साबित हो सकता है।
रूस की भूमिका इस युद्ध में सबसे जटिल और बहुआयामी रही है, जो उसके यूक्रेन युद्ध से उत्पन्न रणनीतिक बाध्यताओं, ऊर्जा हितों और वैश्विक प्रभाव बढ़ाने की महत्वाकांक्षाओं से प्रेरित है। सबसे पहले, कूटनीतिक मोर्चे पर रूस ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में अमेरिका-इज़राइल हमलों की तीखी निंदा की, जहां रूसी राजदूत वासिली नेबेन्ज़्या ने इसे “नई साम्राज्यवादी आक्रामकता” का नाम दिया और चेतावनी दी कि इससे मध्य पूर्व में “पूर्ण विखंडन” हो सकता है। व्यावहारिक सहायता के स्तर पर रूस ने ईरान को उन्नत वायु रक्षा प्रणालियों की आपूर्ति तेज कर दी, जो ईरानी जवाबी हमलों में स्पष्ट दिखाई दी—जैसे जॉर्डन पर 100 से अधिक मिसाइल और मानवरहित विमानों के हमलों में केवल 14 को रोका जा सका, जिससे अमेरिकी मिसाइल रक्षा प्रणाली को गंभीर क्षति पहुंची। गुप्तचर और सैन्य सहयोग में भी वृद्धि हुई; विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार रूस ईरान को उपग्रह आधारित मार्गदर्शन और सूचनात्मक सहयोग दे रहा है, जिसका उपयोग हाइफा के शोधन संयंत्र, दुबई के समुद्री क्षेत्र और बहरीन में अमेरिकी नौसैनिक अड्डे पर सटीक हमलों में हुआ। इसके अतिरिक्त रूस ने ईरान को उन्नत लड़ाकू विमान, समुद्र से प्रक्षेपित होने वाली क्रूज़ मिसाइलें और मानवरहित विमानों के उत्पादन की तकनीक की आपूर्ति तेज कर दी, हालांकि रूस-ईरान 2025 के रणनीतिक साझेदारी समझौते में प्रत्यक्ष युद्ध में प्रवेश का कोई बाध्यकारी प्रावधान नहीं है। पुतिन सरकार यूक्रेन में भारी जनहानि और आर्थिक प्रतिबंधों के बोझ से पहले ही दबाव में है, इसलिए मॉस्को ने “गैर-शत्रुतापूर्ण सहायता” की नीति अपनाई है, जिसमें होर्मुज जलडमरूमध्य में रूस-ईरान-चीन के संयुक्त नौसैनिक अभ्यास भी शामिल रहे हैं। रूस ने ईरान को परमाणु ईंधन संवर्धन तकनीक में भी सहयोग दिया है, हालांकि अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी ने इसे शांतिपूर्ण सहयोग बताया है।
रूस को इस युद्ध से होने वाले संभावित फायदे अनेक और रणनीतिक हैं। पहला, वैश्विक ऊर्जा बाजार में उथल-पुथल से प्रत्यक्ष लाभ; होर्मुज जलडमरूमध्य के बंद होने की आशंका से तेल की कीमतें 120 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गईं, जिससे रूस को आर्थिक प्रतिबंधों के बावजूद भारी अतिरिक्त राजस्व मिलने की संभावना है। दूसरा, अमेरिका का सैन्य ध्यान मध्य पूर्व में बंटने से यूक्रेन के पूर्वी मोर्चे पर दबाव कम हुआ है। तीसरा, वैश्विक बहुपक्षीय व्यवस्था को बढ़ावा; उभरते आर्थिक समूहों के विस्तार के साथ डॉलर आधारित व्यापार व्यवस्था को चुनौती देने की कोशिश तेज हुई है। चौथा, हथियार निर्यात में वृद्धि की संभावना।
लेकिन इसके नुकसान भी कम गंभीर नहीं हैं। लंबे युद्ध से रूस के ऊर्जा व्यापार और आर्थिक हितों को झटका लग सकता है, जबकि नए प्रतिबंध उसकी रक्षा उद्योग प्रणाली को प्रभावित कर सकते हैं। यूक्रेन युद्ध के कारण संसाधन पहले ही सीमित हैं और नया मोर्चा आर्थिक दबाव को और बढ़ा सकता है। सबसे बड़ा खतरा परमाणु टकराव का है, जो विश्व स्तर पर विनाशकारी परिणाम ला सकता है। आंतरिक स्तर पर भी युद्ध से जुड़े निर्णयों को लेकर असंतोष बढ़ने की आशंका है।
चीन की भूमिका अधिक परिपक्व, आर्थिक रूप से प्रेरित और दीर्घकालिक रणनीति पर आधारित दिखाई देती है, जो उसके वैश्विक व्यापार मार्गों, ऊर्जा सुरक्षा और अमेरिकी प्रभुत्व को चुनौती देने की नीति से जुड़ी हुई है। कूटनीतिक स्तर पर चीन ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में अमेरिका को वैश्विक अस्थिरता का प्रमुख कारण बताया और कई देशों के नेताओं से संवाद स्थापित कर मध्यस्थता का प्रयास किया। आर्थिक स्तर पर चीन ने ईरान को आपात ऋण सहायता दी, बंदरगाह परियोजनाओं में निवेश बढ़ाया और क्षेत्रीय व्यापार मार्गों को सुरक्षित रखने की कोशिश की। सैन्य सहयोग अपेक्षाकृत सीमित और अप्रत्यक्ष रहा, लेकिन तकनीकी सहायता और गुप्तचर साझेदारी के संकेत मिलते रहे हैं।
चीन को भी इस संघर्ष से कुछ रणनीतिक लाभ मिल सकते हैं। अमेरिका का ध्यान मध्य पूर्व की ओर केंद्रित होने से पूर्वी एशिया में दबाव कम हो सकता है। ऊर्जा आपूर्ति के नए विकल्पों और क्षेत्रीय व्यापार में अवसर भी बढ़ सकते हैं। साथ ही विकासशील देशों के बीच चीन की कूटनीतिक साख मजबूत होने की संभावना है।
हालांकि इसके जोखिम भी बड़े हैं। क्षेत्र में चीन के भारी निवेश और व्यापारिक परियोजनाएं युद्ध से प्रभावित हो सकती हैं। ऊर्जा संकट का असर उसकी अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है और वैश्विक स्तर पर नए प्रतिबंधों का खतरा भी बना रह सकता है। यदि युद्ध का विस्तार हुआ तो एशिया-प्रशांत क्षेत्र में भी तनाव बढ़ सकता है।
रूस और चीन का संयुक्त रुख इस संघर्ष को लंबा खींचने वाला साबित हो सकता है। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अमेरिका को घेरने की रणनीति दिखाई दे रही है, लेकिन दोनों देशों की अपनी सीमाएं भी स्पष्ट हैं—रूस यूक्रेन युद्ध में उलझा हुआ है और चीन आर्थिक चुनौतियों का सामना कर रहा है। इस संघर्ष से जहां बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की संभावना मजबूत हो सकती है, वहीं वैश्विक अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान और परमाणु टकराव का जोखिम भी बढ़ सकता है। ऐसे में यह संकट स्पष्ट रूप से कूटनीति और संवाद की आवश्यकता को रेखांकित करता है, अन्यथा रक्तरंजित रणभूमि वैश्विक आपदा का रूप ले सकती है।
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