संपादकीय
07 Mar, 2026

इक्कीसवीं सदी में नहीं चलेगी किसी भी देश की दादागिरी

वैश्विक राजनीतिक, आर्थिक और पर्यावरणीय परिवर्तनों के बीच बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था के मजबूत होने और वर्चस्ववादी राजनीति के कमजोर पड़ने पर विश्लेषण।

डॉ. शैलेश शुक्ला
इक्कीसवीं सदी के दो दशकों से अधिक के अनुभव ने एक अकाट्य सत्य स्थापित किया है — किसी एकल राष्ट्र का विश्व पर स्थायी वर्चस्व न केवल अव्यावहारिक है, बल्कि इतिहास की दिशा के विरुद्ध भी है। द्वितीय विश्वयुद्ध की राख से उठी वह अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था, जो बहुपक्षीयता, संप्रभुता और समानता के सिद्धांतों पर आधारित थी, आज एक नए परीक्षण से गुजर रही है। एक ओर पुरानी वर्चस्ववादी शक्तियाँ अपनी घटती प्रासंगिकता को थामने के लिए संघर्ष कर रही हैं, तो दूसरी ओर नई उभरती शक्तियाँ वैश्विक शासन में अपना न्यायसंगत स्थान मांग रही हैं। यह संघर्ष और रूपांतरण का वह दौर है, जिसमें इस सिद्धांत को दृढ़ता से स्थापित करना आवश्यक है कि इक्कीसवीं सदी में किसी भी देश की दादागिरी नहीं चलेगी।
शीतयुद्ध की समाप्ति के बाद वाशिंगटन पोस्ट के पुलित्ज़र पुरस्कार विजेता स्तंभकार चार्ल्स क्राउथैमर ने फ़ॉरेन अफेयर्स के शीतकाल 1990/91 अंक में ‘एकध्रुवीय क्षण’ की अवधारणा प्रस्तुत की थी। यह निबंध सोवियत संघ के औपचारिक विघटन (25 दिसंबर 1991) से पहले ही लिखा गया था। ‘क्षण’ शब्द स्वयं उसकी क्षणभंगुरता का संकेत था। विश्व बैंक के आंकड़े बताते हैं कि 2000 में वैश्विक जीडीपी में अमेरिका की हिस्सेदारी 30–31 प्रतिशत थी, जो 2023 में घटकर 25–26 प्रतिशत रह गई। इसी अवधि में चीन की हिस्सेदारी 3.6 प्रतिशत से बढ़कर 17–18 प्रतिशत हो गई। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने अक्तूबर 2024 में पुष्टि की कि क्रय शक्ति समता के आधार पर उभरती अर्थव्यवस्थाएँ वैश्विक जीडीपी का 60 प्रतिशत से अधिक हिस्सा बनाती हैं। यह एकध्रुवीय भ्रम का अंत है।
वर्चस्ववादी महत्वाकांक्षा की सबसे मार्मिक कीमत अफगानिस्तान और इराक में चुकाई गई। ब्राउन विश्वविद्यालय के कॉस्ट्स ऑफ वॉर प्रोजेक्ट के अनुसार 7 अक्तूबर 2001 को आरंभ हुए अफगानिस्तान आक्रमण की व्यापक दीर्घकालिक लागत 2.313 ट्रिलियन डॉलर रही। 2,459 अमेरिकी सैन्यकर्मी मारे गए और 30 अगस्त 2021 की अव्यवस्थित वापसी के बाद तालिबान पुनः सत्ता में आ गया। इराक युद्ध (2003) में पेंटागन का प्रत्यक्ष व्यय 815 अरब डॉलर था, जबकि दीर्घकालिक लागत 1.9 ट्रिलियन डॉलर तक पहुँची। इराक बॉडी काउंट के अनुसार 1,50,000 से अधिक नागरिक मारे गए और इस युद्ध ने जिस राजनीतिक शून्य को जन्म दिया, उसमें इस्लामिक स्टेट का उदय हुआ। ये परिणाम संयोग नहीं, बल्कि वर्चस्ववादी बल-प्रयोग के तार्किक परिणाम हैं।
24 फरवरी 2022 को रूस ने यूक्रेन पर पूर्ण आक्रमण कर संयुक्त राष्ट्र चार्टर के मूलभूत सिद्धांतों का उल्लंघन किया। यूएनएचसीआर के मध्य 2024 के आंकड़ों के अनुसार यूक्रेन के भीतर 35–37 लाख लोग आंतरिक रूप से विस्थापित हुए और 62–67 लाख शरणार्थी विदेश गए — द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद यूरोप का सबसे बड़ा शरणार्थी संकट। विश्व बैंक के 2023 के आकलन में यूक्रेन की पुनर्निर्माण आवश्यकताएँ 411 अरब डॉलर (2024 में 500 अरब डॉलर से अधिक) आंकी गईं। पश्चिमी खुफिया आकलनों के अनुसार 2024 तक रूस की हानि 3,00,000 से अधिक रही। परमाणु-सशस्त्र रूस भी एक जागरूक जनता की स्वाधीनता की इच्छाशक्ति को नहीं कुचल सका — यही बहुध्रुवीय युग का संदेश है।
चीन की नाममात्र जीडीपी 2000 में 1.21 ट्रिलियन डॉलर से बढ़कर 2023 में 17.8 ट्रिलियन डॉलर हो गई। क्रय शक्ति समता के आधार पर चीन लगभग 2016 से विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। उसने विश्व की सबसे बड़ी नौसेना (पोत संख्या के आधार पर) बनाई और 140 से अधिक देशों में 843 अरब डॉलर के बीआरआई लेनदेन किए। लेकिन दक्षिण चीन सागर में 12 जुलाई 2016 को स्थायी मध्यस्थता न्यायालय ने स्पष्ट किया कि ‘नौ-डैश लाइन’ दावों का यूएनसीएलओएस में कोई आधार नहीं है। चीन की यह वर्चस्ववादी मनोवृत्ति ही क्वाड और ऑकस जैसे प्रति-गठबंधनों को जन्म देती है। यह सिद्ध करता है कि आक्रामकता से शक्ति नहीं, बल्कि प्रतिरोध जन्म लेता है।
2023 में भारत 142 करोड़ से अधिक जनसंख्या के साथ विश्व का सर्वाधिक आबादी वाला देश बना। आईएमएफ के अनुसार 2022 में वह यूके को पछाड़कर पाँचवीं और मध्य 2025 में जापान को पछाड़कर चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है। 9–10 सितंबर 2023 की जी-20 दिल्ली बैठक में भारत की अध्यक्षता में 55 देशों के अफ्रीकी संघ को स्थायी सदस्यता मिली, जो ग्लोबल साउथ की आवाज़ को वैश्विक शासन में शामिल करने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम था। क्वाड और एससीओ दोनों में सहभागिता करते हुए भारत जो सामरिक स्वायत्तता प्रदर्शित करता है, वह इक्कीसवीं सदी की बहुध्रुवीय कूटनीति का प्रतिमान है।
आईपीसीसी की एआर6 रिपोर्ट (2021–2023) के अनुसार वैश्विक तापमान पूर्व-औद्योगिक स्तरों से 1.1 डिग्री सेल्सियस बढ़ चुका है। अमेरिका ऐतिहासिक संचयी उत्सर्जन में 25 प्रतिशत हिस्सेदारी के साथ सबसे बड़ा योगदानकर्ता रहा है, जबकि चीन 2006 से सबसे बड़ा वार्षिक उत्सर्जक है। वर्चस्ववादी प्रतिस्पर्धा ने दोनों के बीच जलवायु गतिरोध उत्पन्न किया, जिसने सामूहिक कार्रवाई को बाधित किया। जलवायु संकट की निर्मम वास्तविकता यह है कि वह किसी भी देश की सैन्य शक्ति या आर्थिक बड़प्पन की परवाह नहीं करता। इसका समाधान केवल सहयोग में है, प्रतिस्पर्धा में नहीं।
2014 में स्थापित न्यू डेवलपमेंट बैंक (100 अरब डॉलर अधिकृत पूंजी) और 2016 में 57 संस्थापक सदस्यों के साथ स्थापित एशियाई अवसंरचना निवेश बैंक (अब 111 सदस्य) उस प्रयास के प्रतीक हैं, जो पश्चिमी वित्तीय वर्चस्व को चुनौती दे रहा है। 2022 में रूसी बैंकों को स्विफ्ट से बाहर करने और 300–330 अरब डॉलर की संप्रभु परिसंपत्तियाँ फ्रीज करने के बाद डी-डॉलरीकरण की प्रक्रिया और तेज हो गई। विडंबना यह है कि वित्तीय हथियारबंदी जितनी बढ़ती है, वैकल्पिक व्यवस्थाओं की मांग उतनी ही तीव्र होती है। डॉलर की सर्वोच्चता उसी दिन से कमजोर पड़ने लगी, जिस दिन उसे हथियार बनाया गया।
2050 तक अफ्रीका की जनसंख्या 2.5 अरब होगी और औसत आयु महज 18–19 वर्ष होगी, जबकि यूरोप में यह 43 वर्ष है। जी-77 के 134 सदस्य राज्य वैश्विक बहुमत का प्रतिनिधित्व करते हैं। अफ्रीका के पास हरित ऊर्जा के महत्वपूर्ण खनिज — कोबाल्ट, लिथियम, मैंगनीज — उपलब्ध हैं, किंतु उनका आर्थिक लाभ व्यापक रूप से अफ्रीकी जनता तक नहीं पहुँचता। 22 सितंबर 2024 को संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा अपनाई गई ‘भविष्य के लिए संधि’ — भले ही गैर-बाध्यकारी हो — इस तथ्य का संकेत है कि विश्व समुदाय अधिक न्यायसंगत व्यवस्था की मांग कर रहा है। ग्लोबल साउथ को नीति-निर्माण में समान भागीदार बनाना अब नैतिक दायित्व ही नहीं, रणनीतिक अनिवार्यता भी है।
यह विमर्श किसी भावुक आदर्शवाद का परिणाम नहीं, बल्कि ठोस तथ्यों, आंकड़ों और घटनाओं के आलोक में निकला निष्कर्ष है। बहुध्रुवीयता अब सिद्धांत नहीं, संरचनात्मक वास्तविकता है। अफगानिस्तान में 2.313 ट्रिलियन डॉलर व्यय कर भी जीत नहीं मिली; इराक में 1.9 ट्रिलियन डॉलर की लागत से क्षेत्र और अस्थिर हुआ; यूक्रेन में परमाणु शक्ति भी एक जागरूक जनता को नहीं दबा सकी; दक्षिण चीन सागर में मनमानी का न्यायिक खंडन हो चुका है। इक्कीसवीं सदी उन राष्ट्रों की है, जो शक्ति को गठबंधन बनाने, संस्थाएँ खड़ी करने और साझी चुनौतियों का मिलकर समाधान करने की क्षमता के रूप में देखते हैं — न कि दूसरों को झुकाने की ताकत के रूप में। कीव से गज़ा से दक्षिण चीन सागर तक इतिहास लिख रहा है: दादागिरी का युग समाप्त हो रहा है।
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आज का राशिफल

पूर्व नियोजित कार्यक्रम सरलता से संपन्न हो जाएंगे। जोखिम से दूर रहना ही बुद्घिमानी होगी। शुभ कार्यों की प्रवृत्ति बनेगी और शुभ समाचार भी मिलेंगे। किसी से कहा सुनी न हो यही ध्यान रहे। अपना कार्य दूसरों के सहयोग से बना लेंगे। लाभकारी गतिविधियों में सक्रियता रहेगी। शुभांक-1-4-6

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