मध्यप्रदेश में आदिवासी छात्रों को शिक्षा के क्षेत्र में आगे बढ़ाने के लिए सरकार द्वारा चलाई जा रही छात्रवृत्ति योजना का उद्देश्य बेहद स्पष्ट और सराहनीय है—गरीब और वंचित आदिवासी विद्यार्थियों को आर्थिक सहायता देकर उन्हें मुख्यधारा की शिक्षा से जोड़ना। लेकिन जब इस योजना को लागू करने वाला तंत्र ही भ्रष्टाचार की दलदल में धंस जाए, तो सवाल उठना लाज़मी है कि आखिर उन मासूम विद्यार्थियों का भविष्य कौन बचाएगा, जिनके नाम पर योजनाएं बनती हैं।
दरअसल, “खेत की बाड़ ही फसल खाने लगे” जैसी कहावत इन दिनों मध्यप्रदेश के आदिम जाति कल्याण विभाग पर बिल्कुल सटीक बैठती नजर आ रही है। 2017 से 2019 के बीच हुई एक ऑडिट रिपोर्ट ने जो खुलासे किए हैं, वे न केवल चौंकाने वाले हैं, बल्कि व्यवस्था की साख पर गंभीर सवाल भी खड़े करते हैं।
ऑडिट में सामने आया है कि प्रदेश के पांच जिलों—सतना, भोपाल, ग्वालियर, जबलपुर और सागर—में आदिवासी छात्रों को दी जाने वाली छात्रवृत्ति की करीब एक करोड़ रुपये की राशि विद्यार्थियों के खातों में जाने के बजाय किसी और के खातों में ट्रांसफर हो गई। सरकार की योजना साफ थी कि छात्रवृत्ति सीधे विद्यार्थियों के बैंक खातों में भेजी जाए, ताकि बिचौलियों और भ्रष्टाचार की गुंजाइश खत्म हो। लेकिन यहां तो पूरी व्यवस्था को ही चकमा दे दिया गया।
जांच में पता चला कि कुछ शैक्षणिक संस्थानों ने छात्रों के खातों की जगह अपने या अन्य खातों की जानकारी विभाग को दे दी। जब कोषालय से छात्रवृत्ति की राशि ट्रांसफर हुई, तो वह सीधे विद्यार्थियों तक पहुंचने के बजाय इन संस्थानों के खातों में चली गई। यह केवल एक प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि सुनियोजित भ्रष्टाचार का संकेत देता है। सवाल यह है कि इतने लंबे समय तक यह खेल चलता रहा और किसी अधिकारी को भनक तक नहीं लगी।
मामला तब उजागर हुआ जब प्रधान महालेखाकार के दल ने संबंधित भुगतान की ऑडिट की। ऑडिट के दौरान यह चौंकाने वाला तथ्य सामने आया कि छात्रवृत्ति की राशि उन खातों में जा रही थी, जिनका छात्रों से कोई लेना-देना ही नहीं था। यह खुलासा अपने आप में बताता है कि सिस्टम में कहीं न कहीं गंभीर लापरवाही या मिलीभगत मौजूद थी, क्योंकि छात्रवृत्ति जैसी संवेदनशील योजना में बैंक खातों की जांच और सत्यापन एक अनिवार्य प्रक्रिया होती है। यदि यह प्रक्रिया सही ढंग से अपनाई गई होती, तो इतनी बड़ी गड़बड़ी संभव ही नहीं थी।
सबसे बड़ा और चिंताजनक सवाल यही है कि जब केवल पांच जिलों की ऑडिट में लगभग एक करोड़ रुपये की गड़बड़ी सामने आई है, तो यदि मध्यप्रदेश के सभी 55 जिलों की जांच हो जाए, तो भ्रष्टाचार का यह आंकड़ा कई सौ करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है। आदिवासी छात्रों के नाम पर चलने वाली योजनाएं अक्सर भ्रष्ट तंत्र का आसान शिकार बन जाती हैं, क्योंकि इन योजनाओं के लाभार्थी दूरदराज के गांवों में रहने वाले गरीब परिवार होते हैं। उन्हें यह तक पता नहीं चलता कि उनके नाम पर सरकार से पैसा आया भी था या नहीं। यही वजह है कि कुछ लालची अधिकारी और संस्थाएं इस अज्ञानता का फायदा उठाकर सरकारी खजाने को लूटने में लगे रहते हैं।
मध्यप्रदेश सरकार की मंशा आदिवासी छात्रों को शिक्षा के माध्यम से सशक्त बनाने की है। छात्रवृत्ति जैसी योजनाएं इसी सोच का हिस्सा हैं। लेकिन जब विभाग के भीतर बैठे कुछ भ्रष्ट तत्व ही इन योजनाओं को पलीता लगाने लगें, तो सरकार की मंशा भी कठघरे में खड़ी हो जाती है। इस मामले के सामने आने के बाद जनजाति कार्य विभाग के आयुक्त ने जांच करवाने की बात कही है, लेकिन सवाल यह है कि क्या केवल जांच की घोषणा से समस्या हल हो जाएगी। जरूरत इस बात की है कि इस पूरे मामले की गहराई से पड़ताल हो और यह पता लगाया जाए कि इस घोटाले में कौन-कौन शामिल है—कौन अधिकारी, कौन कर्मचारी और कौन संस्थान।
यदि सचमुच छात्रों की छात्रवृत्ति में इस तरह की हेराफेरी हुई है, तो यह केवल वित्तीय घोटाला नहीं, बल्कि सामाजिक अपराध है। क्योंकि यह पैसा उन गरीब आदिवासी छात्रों का था, जिनके लिए यह छात्रवृत्ति शिक्षा का सहारा बन सकती थी। कई छात्र ऐसे भी होंगे जो आर्थिक तंगी के कारण पढ़ाई छोड़ने को मजबूर हो गए होंगे, जबकि उनके नाम पर सरकार ने छात्रवृत्ति जारी की होगी। इसलिए इस मामले में केवल औपचारिक जांच या कागजी कार्रवाई से काम नहीं चलेगा। दोषियों की पहचान कर उनके खिलाफ कड़ी से कड़ी कार्रवाई करनी होगी।
इस तरह की घटनाओं को रोकने के लिए छात्रवृत्ति वितरण प्रणाली को और अधिक पारदर्शी और तकनीकी रूप से मजबूत बनाने की जरूरत है। आधार आधारित सत्यापन, बैंक खातों की डिजिटल जांच और नियमित ऑडिट जैसी व्यवस्थाएं लागू करनी होंगी। साथ ही छात्रों और उनके अभिभावकों को भी यह जानकारी दी जानी चाहिए कि उनके खाते में कितनी राशि आई है और कब आई है।
आदिवासी छात्रों के भविष्य से जुड़ी योजनाओं में भ्रष्टाचार केवल आर्थिक नुकसान नहीं, बल्कि सामाजिक अन्याय भी है। यदि सच में शिक्षा के माध्यम से आदिवासी समाज को मुख्यधारा से जोड़ना है, तो सबसे पहले उन लोगों पर लगाम लगानी होगी, जो योजनाओं को लूट का माध्यम बना रहे हैं। क्योंकि जब खेत की बाड़ ही फसल खाने लगे, तो फसल का बचना लगभग असंभव हो जाता है। यदि समय रहते इस पर सख्त कार्रवाई नहीं हुई, तो यह घोटाला केवल पांच जिलों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरे प्रदेश में आदिवासी छात्रों के भविष्य को निगलने वाला एक बड़ा भ्रष्टाचार बन जाएगा।