विधानसभा में लोक निर्माण विभाग पर हुई चर्चा ने एक बार फिर सरकार की प्राथमिकताओं और जवाबदेही पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिए हैं। सड़कों के धंसने, पुलों के गिरने और निर्माण कार्यों में कथित भ्रष्टाचार को लेकर विपक्ष ने सरकार को कठघरे में खड़ा किया। मुद्दा केवल तकनीकी त्रुटि का नहीं था, बल्कि उस मानसिकता का था जो हर सवाल के जवाब में तर्कों की दीवार खड़ी कर देती है।
विपक्ष ने विशेष रूप से लोक निर्माण विभाग में हुए कथित भारी भ्रष्टाचार, पूर्वी एनसी मेहरा प्रकरण, जबलपुर, भोपाल और रायसेन सहित कई जिलों में नव-निर्मित सड़कों के उखड़ने और पुलों की बदहाली का मुद्दा उठाया। आरोप यह भी लगे कि निर्माण कार्यों में गुणवत्ता की अनदेखी कर जनता के पैसों से समझौता किया गया। लेकिन बहस का केंद्र बन गया लोक निर्माण मंत्री राकेश सिंह का वह बयान, जिसमें उन्होंने कहा कि “90 डिग्री का पुल कोई शर्म की बात नहीं है, दुनिया के कई देशों में ऐसे पुल बनते हैं।”
मंत्री का यह तर्क तकनीकी बहस का विषय हो सकता है, लेकिन सवाल यह है कि क्या प्रदेश में बने संबंधित पुलों की डिजाइन, सुरक्षा मानकों और उपयोगिता की जांच अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप की गई थी? यदि सब कुछ सही था, तो संबंधित अधिकारियों को निलंबित क्यों किया गया? यदि गलती नहीं थी तो कार्रवाई क्यों? और यदि कार्रवाई जरूरी थी, तो फिर सार्वजनिक मंच से उस निर्माण को उचित ठहराने की जिद क्यों?
विपक्ष के विधायक रामेश्वर शर्मा ने “डबल इंजन सरकार” की उपलब्धियों का हवाला देते हुए मेट्रो, फ्लाईओवर और हाईवे जैसे बुनियादी ढांचे की चर्चा की। लेकिन उपलब्धियों की चमक के पीछे यदि गुणवत्ता का अंधेरा छिपा हो, तो जनता को केवल विज्ञापन नहीं, जवाब भी चाहिए। सड़कों का कुछ ही महीनों में उखड़ जाना, बरसात में पुलों का बह जाना और गड्ढों से भरी सड़कें विकास के दावों पर प्रश्नचिह्न लगाती हैं।
मंत्री का यह कहना कि “90 डिग्री का पुल अपराध नहीं है” शायद शाब्दिक रूप से सही हो, लेकिन जनभावना में यह बयान एक प्रकार की असंवेदनशीलता के रूप में दर्ज हुआ है। जनता यह नहीं देखती कि कोण कितना है; वह यह देखती है कि पुल सुरक्षित है या नहीं, सड़क टिकाऊ है या नहीं और उसके टैक्स का पैसा सही जगह लगा या नहीं। तकनीकी उदाहरणों की आड़ में जिम्मेदारी से बचना लोकतांत्रिक व्यवस्था की आत्मा के विपरीत है।
इसी बहस के दौरान मेट्रो परियोजनाओं में पार्किंग व्यवस्था के अभाव का मुद्दा भी उठा। विपक्ष ने पूछा कि यदि मेट्रो बनाई जा रही है तो पार्किंग की समुचित व्यवस्था क्यों नहीं? क्या यात्री हवा में उड़कर स्टेशन पहुंचेंगे? इस पर मंत्री ने यह कहकर पल्ला झाड़ लिया कि यह उनके विभाग का कार्यक्षेत्र नहीं है। लेकिन जनता के लिए विभागों की सीमाएं नहीं, सुविधाओं की समग्रता मायने रखती है। विकास समन्वय से होता है, विभागीय खांचों से नहीं।
विधानसभा केवल आंकड़ों और तकनीकी तर्कों की प्रयोगशाला नहीं है; यह जनता की आकांक्षाओं और आशंकाओं का मंच है। जब वहां उठे सवालों को गंभीरता से लेने के बजाय उन्हें भाषाई कलाबाजी से टालने की कोशिश होती है, तो संदेश यह जाता है कि सरकार आत्ममंथन के बजाय आत्मरक्षा में अधिक व्यस्त है।
लोक निर्माण विभाग किसी भी राज्य की रीढ़ होता है। सड़कें, पुल, फ्लाईओवर और भवन केवल कंक्रीट की संरचनाएं नहीं, बल्कि जनता के विश्वास के प्रतीक होते हैं। यदि वे बार-बार दरकते हैं, तो केवल ढांचा नहीं, भरोसा भी दरकता है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि सरकार तकनीकी उदाहरणों से आगे बढ़कर पारदर्शिता, स्वतंत्र जांच और गुणवत्ता नियंत्रण की ठोस व्यवस्था प्रस्तुत करे। 90 डिग्री के पुल का वैश्विक उदाहरण देने से पहले यह सुनिश्चित करना होगा कि मध्य प्रदेश की धरती पर बना हर पुल 100 प्रतिशत सुरक्षित और टिकाऊ हो। क्योंकि लोकतंत्र में कोण नहीं, जवाबदेही सीधी होनी चाहिए।