संपादकीय
09 Mar, 2026

बच्चों में बढ़ता मोटापा एक उभरती साइलेंट महामारी

भारत में बच्चों में बढ़ता मोटापा गंभीर स्वास्थ्य चुनौती है, संतुलित आहार, नियमित व्यायाम और स्वस्थ जीवनशैली से इसे रोका जा सकता है।

भारत में बच्चों के स्वास्थ्य से जुड़ी चिंताएं पहले कुपोषण और कम वजन तक सीमित मानी जाती थीं, लेकिन अब तस्वीर तेजी से बदल रही है। आज देश एक नई स्वास्थ्य चुनौती का सामना कर रहा है—बचपन में बढ़ता मोटापा। हाल की रिपोर्टों के अनुसार भारत में मोटापा अब बच्चों के बीच “साइलेंट महामारी” का रूप लेता जा रहा है। यह समस्या धीरे-धीरे बढ़ रही है और इसके परिणाम भविष्य में गंभीर स्वास्थ्य संकट का कारण बन सकते हैं।
दुनिया भर में लंबे समय तक बच्चों की सबसे बड़ी स्वास्थ्य समस्या कुपोषण और कम वजन मानी जाती रही है। लेकिन अब हालात बदल रहे हैं। वर्ल्ड ओबेसिटी एटलस की रिपोर्ट के अनुसार 2025 से 2027 के बीच दुनिया में कम वजन वाले बच्चों की तुलना में मोटापे से पीड़ित बच्चों की संख्या अधिक हो जाएगी। इसका मतलब यह है कि वैश्विक स्वास्थ्य संकट का केंद्र अब कुपोषण से मोटापे की ओर स्थानांतरित हो रहा है। भारत भी इस बदलती तस्वीर का हिस्सा बन चुका है। बच्चों में मोटापे के मामलों में भारत अब चीन के बाद दुनिया में दूसरे स्थान पर पहुंच गया है। यह स्थिति चिंताजनक है, क्योंकि भारत जैसे देश में अभी भी कुपोषण की समस्या पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है और इसके साथ-साथ मोटापा भी तेजी से बढ़ रहा है।
आंकड़ों के अनुसार भारत में 5 से 19 वर्ष की आयु के लगभग 4.1 करोड़ बच्चे उच्च बॉडी मास इंडेक्स (बीएमआई) के साथ जी रहे हैं। इनमें से करीब 1.4 करोड़ बच्चे मोटापे के शिकार हैं। यह संख्या केवल एक स्वास्थ्य समस्या नहीं, बल्कि आने वाले समय के लिए एक सामाजिक और आर्थिक चुनौती भी है। 2010 से 2025 के बीच भारत में 5 से 19 वर्ष के बच्चों में उच्च बीएमआई के मामलों में लगभग 4.8 प्रतिशत की सालाना वृद्धि दर्ज की गई है। वहीं 5 वर्ष से कम उम्र के बच्चों में भी मोटापा 4.4 प्रतिशत की वार्षिक दर से बढ़ रहा है। यह संकेत देता है कि समस्या केवल किशोरों तक सीमित नहीं है, बल्कि छोटे बच्चों में भी तेजी से फैल रही है।
बच्चों में बढ़ते मोटापे के पीछे कई कारण जिम्मेदार हैं। सबसे महत्वपूर्ण कारण है शारीरिक गतिविधियों में कमी। आधुनिक जीवनशैली में बच्चों का समय मोबाइल, टीवी, वीडियो गेम और कंप्यूटर के सामने अधिक बीत रहा है। खेल-कूद और शारीरिक गतिविधियों में कमी से शरीर में अतिरिक्त कैलोरी जमा होने लगती है। इसके अलावा खान-पान की आदतों में बदलाव भी एक बड़ा कारण है। फास्ट फूड, पैकेट वाले स्नैक्स, मीठे पेय पदार्थ और जंक फूड का सेवन बच्चों में तेजी से बढ़ा है। ये खाद्य पदार्थ कैलोरी से भरपूर होते हैं, लेकिन इनमें पोषण की मात्रा कम होती है।
रिपोर्ट के अनुसार केवल 35.5 प्रतिशत बच्चों को स्कूल में नियमित भोजन मिल पा रहा है। यह स्थिति भी संतुलित पोषण की कमी की ओर संकेत करती है। इसी तरह 1 से 5 माह के लगभग 32.6 प्रतिशत शिशुओं को पर्याप्त स्तनपान नहीं मिल पाता, जिससे शुरुआती जीवन में पोषण असंतुलन पैदा होता है।
बच्चों में मोटापे का संबंध माताओं के स्वास्थ्य से भी जुड़ा हुआ है। यदि माता मोटापे की शिकार होती हैं, तो बच्चों में मोटापे का जोखिम बढ़ जाता है। गर्भावस्था के दौरान असंतुलित आहार, शारीरिक गतिविधियों की कमी और खराब जीवनशैली का प्रभाव सीधे बच्चे के स्वास्थ्य पर पड़ सकता है। इसलिए विशेषज्ञ मानते हैं कि बच्चों में मोटापा रोकने के लिए माताओं के स्वास्थ्य और पोषण पर विशेष ध्यान देना आवश्यक है।
भारत में बच्चों के मोटापे का एक दिलचस्प पहलू यह भी है कि यह समस्या शहरों में गांवों की तुलना में अधिक देखने को मिलती है। आंकड़ों के अनुसार शहरी क्षेत्रों में बच्चों में मोटापे की दर गांवों से लगभग 10 प्रतिशत अधिक है। इसका कारण शहरी जीवनशैली है। शहरों में बच्चों की दिनचर्या अधिक बैठकर पढ़ने, स्क्रीन देखने और सीमित शारीरिक गतिविधियों से जुड़ी होती है। वहीं ग्रामीण क्षेत्रों में बच्चों को प्राकृतिक रूप से अधिक शारीरिक गतिविधि मिलती है, जैसे चलना, खेलना और बाहरी कामों में भाग लेना।
बचपन में मोटापा केवल वजन बढ़ने की समस्या नहीं है, बल्कि यह कई गंभीर बीमारियों की शुरुआत भी हो सकता है। मोटापे से पीड़ित बच्चों में भविष्य में मधुमेह, हृदय रोग, उच्च रक्तचाप और हार्मोन से जुड़ी समस्याओं का खतरा बढ़ जाता है। रिपोर्टों में यह भी चेतावनी दी गई है कि मोटापे से बच्चों में लिवर डैमेज, फैटी लिवर और कुछ प्रकार के कैंसर का जोखिम भी बढ़ सकता है। यदि बचपन में ही मोटापा नियंत्रित नहीं किया गया, तो वयस्क होने तक यह समस्या और गंभीर रूप ले सकती है।
भारतीय समाज में लंबे समय तक यह धारणा रही है कि गोल-मटोल बच्चा स्वस्थ होता है। कई माता-पिता बच्चों के मोटापे को स्वास्थ्य का संकेत मानते हैं। लेकिन आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के अनुसार यह सोच गलत है। दरअसल बच्चों में अत्यधिक वजन शरीर के अंदर धीरे-धीरे कई बीमारियों की नींव रखता है। मोटापा अक्सर बिना किसी स्पष्ट लक्षण के शरीर को नुकसान पहुंचाता रहता है, इसलिए इसे “साइलेंट महामारी” कहा जा रहा है।
बच्चों में मोटापा रोकने के लिए परिवार, स्कूल और सरकार सभी को मिलकर प्रयास करने होंगे। सबसे पहले बच्चों को नियमित शारीरिक गतिविधियों के लिए प्रेरित करना जरूरी है। स्कूलों में खेल-कूद और व्यायाम को शिक्षा का अनिवार्य हिस्सा बनाया जाना चाहिए। खान-पान की आदतों में सुधार भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। बच्चों को जंक फूड की बजाय फल, सब्जियां, दूध, दाल और संतुलित आहार देने की आदत विकसित करनी चाहिए। साथ ही स्क्रीन टाइम को सीमित करना भी आवश्यक है। सरकार को भी स्कूल पोषण कार्यक्रमों को मजबूत करने और बच्चों में स्वास्थ्य जागरूकता बढ़ाने के लिए विशेष अभियान चलाने की जरूरत है।
भारत में बच्चों में बढ़ता मोटापा एक गंभीर चेतावनी है। यह समस्या केवल स्वास्थ्य से जुड़ी नहीं है, बल्कि देश के भविष्य से भी संबंधित है। यदि समय रहते इस पर नियंत्रण नहीं किया गया, तो आने वाली पीढ़ी कई गंभीर बीमारियों से घिर सकती है। इसलिए जरूरी है कि परिवार, समाज और सरकार मिलकर बच्चों के स्वस्थ जीवन के लिए प्रयास करें। संतुलित आहार, नियमित व्यायाम और स्वस्थ जीवनशैली अपनाकर ही इस साइलेंट महामारी को रोका जा सकता है। तभी हम एक स्वस्थ और सशक्त भविष्य की नींव रख पाएंगे।
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