प्रशांत महासागर, 01 मार्च 2026।
इतिहास के पन्नों में 1 मार्च की तारीख विश्व में परमाणु परीक्षणों की भयावह यादों से जुड़ी हुई है। द्वितीय विश्व युद्ध में हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बम गिरने के बाद माना जा रहा था कि मानवता इन खतरनाक हथियारों से दूरी बनाएगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। अमेरिका ने युद्ध के बाद के दशक में प्रशांत महासागर स्थित बिकनी अटोल क्षेत्र में कई परमाणु परीक्षण किए, जिनमें सबसे बड़ा परीक्षण 1954 में 1 मार्च को किया गया था। इस परीक्षण को कैसल ब्रावो नाम दिया गया था और इसे अब तक का सबसे शक्तिशाली अमेरिकी परमाणु परीक्षण माना जाता है।
बिकनी अटोल प्रशांत महासागर में स्थित एक कोरल द्वीप समूह है, जिसका आकार अंगूठी जैसा है। इसमें 23 छोटे कोरल द्वीप शामिल हैं और यह हवाई तथा फिलीपींस के बीच समुद्री क्षेत्र में स्थित है। परमाणु परीक्षण के बाद यह स्थान विश्व के सबसे चर्चित क्षेत्रों में शामिल हो गया। धमाके की तीव्रता इतनी अधिक थी कि एक फ्रांसीसी डिजाइनर ने इसके नाम पर स्विमिंग सूट का नाम भी रख दिया। इस परीक्षण में लगभग 150 लाख टन क्षमता का विस्फोट हुआ, जो हिरोशिमा पर गिराए गए बम से लगभग हजार गुना अधिक शक्तिशाली था। विस्फोट के कारण लगभग दो किलोमीटर चौड़ा गड्ढा बन गया।
विस्फोट के प्रभाव से बिकनी अटोल से लगभग 160 किलोमीटर दूर स्थित द्वीपों पर भी तेज झटके महसूस किए गए। कुछ घंटों बाद रेडियोधर्मी पदार्थ हवा, पानी और भोजन पर गिरने लगे। विस्फोट के पास रहने वाले लोगों को तत्काल वहां से हटाया गया। 1964 में अमेरिकी सरकार ने स्वीकार किया कि उसकी गलती से द्वीपवासियों को रेडिएशन का सामना करना पड़ा और प्रभावित लोगों को मुआवजा भी दिया गया। वर्ष 2010 में संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक संगठन ने बिकनी अटोल को विश्व धरोहर स्थल घोषित किया और इसे शीत युद्ध तथा परमाणु हथियारों की होड़ का महत्वपूर्ण प्रमाण बताया।



