काठमांडू, 07 फरवरी।
नेपाल की राजनीति में एक बार फिर राष्ट्रीय स्वतन्त्र पार्टी (रास्वपा) के अध्यक्ष रवि लामिछाने चर्चा में हैं। वह चितवन निर्वाचन क्षेत्र नंबर–2 से तीसरी बार प्रतिनिधि सभा चुनाव मैदान में हैं, लेकिन चुनाव जीतने की स्थिति में भी उनके संसद में प्रवेश और किसी संवैधानिक या कार्यकारी पद संभालने पर संशय बना हुआ है। वजह उनके खिलाफ लंबित कानूनी मामले हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अप्रैल 2023 के उपचुनाव में नवंबर 2022 की तुलना में बढ़े मतों के आधार पर चितवन–2 में उनकी पकड़ अब भी मजबूत है। हालांकि, अदालतों में लंबित मामलों के कारण निर्वाचित होने पर भी उनके सांसद, मंत्री या प्रधानमंत्री के रूप में कार्यभार ग्रहण करने में कानूनी अड़चनें आ सकती हैं।
लामिछाने के खिलाफ बुटवल की सुप्रीम सहकारी, पोखरा की सूर्य दर्शन सहकारी, काठमांडू की स्वर्ण लक्ष्मी सहकारी, चितवन की सहारा सहकारी और पर्सा की सानो पैला सहकारी से जुड़े कथित बचत गबन के मामले न्यायालयों में विचाराधीन हैं। इसके अलावा संगठित अपराध और धनशोधन से जुड़े आरोपों को लेकर भी कानूनी प्रक्रिया जारी है।
सरकार ने महान्यायाधिवक्ता कार्यालय के माध्यम से संगठित अपराध और मनी लॉन्ड्रिंग के आरोप वापस लेने की पहल की थी। 14 जनवरी 2025 को महान्यायाधिवक्ता रेनु भंडारी ने संबंधित जिला अदालतों में आरोपपत्र संशोधित करने का निर्णय लिया। इस कदम को चुनौती देते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता दिनेश त्रिपाठी सहित अन्य ने सर्वोच्च न्यायालय में रिट याचिकाएं दायर की हैं, जिन पर सुनवाई लंबित है।
रुपन्देही जिला अदालत ने स्पष्ट किया है कि सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के बाद ही आगे की कार्रवाई होगी। नागरिकता विवाद सुलझने के बावजूद पासपोर्ट से जुड़ा एक अलग मामला भी विचाराधीन है। विधि विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे गंभीर आरोपों के बीच सार्वजनिक पद ग्रहण करना नैतिक और कानूनी दोनों दृष्टि से जटिल प्रश्न खड़ा करता है।



