प्रयागराज, 27 फ़रवरी।
परमार्थ त्रिवेणी पुष्प परिसर, संगम तट पर भगवान श्री जगन्नाथ जी के प्राण-प्रतिष्ठा समारोह के समापन अवसर पर स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने उपस्थित जनसमूह को अपने हृदय में ईश्वर की चेतना जगाने और संस्कार, सेवा व सद्भाव के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि जब तक हमारे भीतर यह प्रतिष्ठा नहीं होगी, समाज में वास्तविक परिवर्तन संभव नहीं है।
स्वामी जी ने ऋषिकन्याओं द्वारा संगम आरती की परंपरा शुरू करने का आह्वान किया और कहा कि बेटियाँ केवल परिवार की शक्ति नहीं, बल्कि संस्कृति और राष्ट्र की आधारशिला हैं। उन्होंने कन्या गुरूकुल खोलने की घोषणा की, जिसमें बालिकाओं को वेद, संस्कृत, योग, ध्यान, भारतीय संस्कृति, पर्यावरण संरक्षण और आधुनिक शिक्षा का समन्वित प्रशिक्षण दिया जाएगा।
उन्होंने संगम की पवित्रता और स्वच्छता बनाए रखने पर जोर देते हुए कहा कि बाहरी और भीतरी स्वच्छता आवश्यक है। नदियों के संगम की तरह हमें अपने विचारों और कर्मों को भी निर्मल रखना होगा। स्वामी जी ने सामाजिक एकता और आपसी सद्भाव पर भी बल दिया और कहा कि जाति, भाषा और क्षेत्र के भेदभाव से ऊपर उठकर प्रेम और सहयोग का संगम बनाना ही राष्ट्र की शक्ति है।
समारोह में संत समाज, शिक्षाविद, न्यायविद, अधिकारी, उद्योगपति और श्रद्धालुओं की उपस्थिति रही। वैदिक मंत्रोच्चार, हवन, यज्ञ और पूर्णाहुति के साथ आयोजन आध्यात्मिक ऊर्जा से परिपूर्ण हुआ। स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने आयोजकों और सहयोगियों का अभिनंदन करते हुए सफलता के लिए उनका धन्यवाद किया।



