जिले में लंबे समय से लाइन में बैठे एक दरोगा जी अपनी पदस्थापना को लेकर काफी सक्रिय हैं। उन्होंने ऊपर तक सिफारिशें भी कराईं, कई जगह से कहलवाया भी और अपनी काबिलियत के किस्से भी सुनाए। कोशिशों में कोई कमी नहीं छोड़ी गई।
लेकिन नतीजा अभी तक वही ढाक के तीन पात है। जिस उम्मीद के साथ दरोगा जी बड़े साहब के चक्कर लगा रहे थे, वह उम्मीद फिलहाल पूरी होती नजर नहीं आ रही। अब हाल यह है कि तमाम सिफारिशों के बाद भी कुर्सी दूर ही दिखाई दे रही है। इसलिए दरोगा जी भी समझने लगे हैं कि शायद अब कोई दूसरा रास्ता तलाशना पड़ेगा।



