पिछले दिनों एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने अपने सहयोगियों को एक बड़ा टास्क सौंपा। आदेश था कि ड्रग सप्लायरों के नेटवर्क पर ऐसा अभियान चलाया जाए कि ड्रग पेडलर गिरोह की जड़ ही हिल जाए। कुछ जगह कार्रवाई शुरू भी हुई, लेकिन जहां-जहां राजनीतिक दखलअंदाजी सामने आई, वहां अभियान की रफ्तार अचानक धीमी पड़ गई।
जब बड़े अधिकारी ने प्रगति पूछी तो जवाब सार्वजनिक मंच पर नहीं, बल्कि एकांत में मिला—“साहब, हमसे न हो पाएगा।” वजह भी कम दिलचस्प नहीं थी। कुछ दिन पहले ही एक पुलिस अधिकारी को एक माननीय के कारण अपना इलाका छोड़कर भोपाल में ‘वनवास’ काटते देखा गया था। बस, वही नजारा देखकर कई लोगों ने समझ लिया कि कुछ मामलों में जोश से ज्यादा होश रखना ही बेहतर है।



