इंसानी गतिविधियों की वजह से पृथ्वी का तापमान लगातार बढ़ रहा है, जिससे लोगों और प्रकृति दोनों को गंभीर खतरा पैदा हो रहा है। वैज्ञानिकों का कहना है कि अगर तुरंत ठोस कदम उठाए जाएं तो क्लाइमेट चेंज के सबसे गंभीर असर को अभी भी कम किया जा सकता है।
क्या है क्लाइमेट चेंज?
क्लाइमेट चेंज का मतलब है पृथ्वी के औसत तापमान और मौसम के पैटर्न में लंबे समय तक होने वाला बदलाव। पिछले करीब 100 सालों में दुनिया तेज़ी से गर्म हुई है और इसके चलते मौसम की स्थिति में बदलाव देखने को मिल रहे हैं।
1980 के दशक के बाद से हर दशक पहले वाले दशक से ज्यादा गर्म रहा है। वर्ल्ड मेटियोरोलॉजिकल ऑर्गनाइज़ेशन के अनुसार, दुनिया के 11 सबसे गर्म साल 2015 के बाद दर्ज किए गए हैं। साल 2024 पृथ्वी का अब तक का सबसे गर्म वर्ष रहा, जिसमें बढ़ते तापमान के लिए मुख्य रूप से क्लाइमेट चेंज को जिम्मेदार माना गया।
यूरोपियन कोपरनिकस क्लाइमेट सर्विस के मुताबिक यह 1800 के दशक के अंत के प्री-इंडस्ट्रियल स्तर की तुलना में 1.5C से अधिक वार्मिंग को पार करने वाला पहला कैलेंडर वर्ष भी रहा। ला नीना जैसे प्राकृतिक मौसम पैटर्न के कारण थोड़ी ठंडक आने के बावजूद 2025 में भी तापमान अपेक्षाकृत अधिक रहा।
इंसान क्लाइमेट चेंज कैसे बढ़ा रहे हैं?
पृथ्वी के इतिहास में जलवायु स्वाभाविक रूप से बदलती रही है, लेकिन पिछली सदी में देखी गई तेज़ गर्मी को केवल प्राकृतिक कारणों से समझाया नहीं जा सकता। वैज्ञानिकों के अनुसार यह मुख्य रूप से इंसानी गतिविधियों का परिणाम है।
घर, फैक्ट्री और परिवहन में कोयला, तेल और गैस जैसे फॉसिल फ्यूल का बड़े पैमाने पर उपयोग किया जा रहा है। इन ईंधनों के जलने से कार्बन डाइऑक्साइड जैसी ग्रीनहाउस गैसें निकलती हैं, जो पृथ्वी के आसपास गर्मी को रोक लेती हैं और तापमान बढ़ाती हैं।
इंडस्ट्रियल रिवोल्यूशन के बाद से वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा 50 प्रतिशत से ज्यादा बढ़ गई है। 800,000 साल के इतिहास में जहां CO2 का स्तर लगभग 180 से 300 पार्ट्स पर मिलियन के बीच रहा, वहीं 2024 में यह 420 पार्ट्स पर मिलियन से अधिक दर्ज किया गया।
क्लाइमेट चेंज के असर क्या दिखाई दे रहे हैं?
क्लाइमेट चेंज के प्रभाव दुनिया भर में स्पष्ट रूप से नजर आने लगे हैं। इनमें प्रमुख रूप से शामिल हैं:
- ज्यादा बार और ज्यादा तीव्र हीटवेव तथा भारी बारिश
- ग्लेशियर और बर्फ की चादरों का तेजी से पिघलना
- समुद्र के स्तर में लगातार बढ़ोतरी
- आर्कटिक क्षेत्र की समुद्री बर्फ का सिकुड़ना
- समुद्र के गर्म होने से तेज़ तूफानों की संभावना और समुद्री जीवन पर खतरा
इन बदलावों का असर लोगों और अर्थव्यवस्था दोनों पर पड़ रहा है। वर्ष 2022 में पूर्वी अफ्रीका के कुछ हिस्सों में 40 वर्षों का सबसे गंभीर सूखा पड़ा, जिससे 20 मिलियन से ज्यादा लोग भूख के संकट का सामना करने लगे।
1.5C की सीमा क्यों महत्वपूर्ण है?
दुनिया जितनी ज्यादा गर्म होगी, क्लाइमेट चेंज का प्रभाव उतना ही गंभीर होता जाएगा। वर्ष 2015 के पेरिस क्लाइमेट समझौते के तहत लगभग 200 देशों ने ग्लोबल वार्मिंग को प्री-इंडस्ट्रियल स्तर से 1.5C तक सीमित रखने का लक्ष्य तय किया।
वैज्ञानिकों का कहना है कि 2C या उससे अधिक तापमान वृद्धि होने पर 1.5C की तुलना में कहीं ज्यादा गंभीर परिणाम सामने आएंगे। इनमें शामिल हैं:
- अधिक लोगों का अत्यधिक गर्मी के संपर्क में आना
- ग्लेशियर पिघलने से समुद्र का स्तर बढ़ना
- कुछ क्षेत्रों में खाद्य सुरक्षा पर बड़ा खतरा
- डेंगू जैसी बीमारियों के फैलने की संभावना बढ़ना
- कई प्रजातियों के विलुप्त होने का खतरा
- अधिकांश कोरल रीफ का समाप्त होना
इसके अलावा ग्रीनलैंड आइस शीट के टूटने, अटलांटिक महासागर की धाराओं में बदलाव और अमेज़न रेनफॉरेस्ट को नुकसान जैसे बड़े पर्यावरणीय बदलाव भी संभव हैं।
सरकारें क्या कर रही हैं?
ग्लोबल वार्मिंग को नियंत्रित करने के लिए नेट ज़ीरो कार्बन उत्सर्जन हासिल करना जरूरी माना जा रहा है। इसका मतलब है कि जितना संभव हो उत्सर्जन कम किया जाए और बाकी उत्सर्जन को वातावरण से हटाने के उपाय किए जाएं।
कई देशों ने नेट ज़ीरो लक्ष्य तय किए हैं। कुछ क्षेत्रों में नवीकरणीय ऊर्जा और इलेक्ट्रिक वाहनों के उपयोग में तेजी भी देखी जा रही है। हालांकि इसके बावजूद वैश्विक CO2 उत्सर्जन अभी भी रिकॉर्ड स्तर पर बना हुआ है।
मौजूदा रफ्तार से तापमान बढ़ने पर 2030 के आसपास 1.5C का लक्ष्य पार होने की आशंका जताई जा रही है। दुनिया के नेता हर साल क्लाइमेट मुद्दों पर बैठक करते हैं, लेकिन हाल की बैठकों में फॉसिल फ्यूल और जंगलों की कटाई को लेकर कोई बड़ा नया समझौता नहीं हो पाया।
लोग क्या कर सकते हैं?
सरकारों और कंपनियों को बड़े फैसले लेने होंगे, लेकिन आम लोग भी कुछ कदम उठाकर योगदान दे सकते हैं:
- कम हवाई यात्रा करना
- ऊर्जा का कम उपयोग करना
- घरों की ऊर्जा दक्षता बढ़ाना
- इलेक्ट्रिक वाहनों का उपयोग करना या कार का कम इस्तेमाल
- गैस हीटिंग की जगह इलेक्ट्रिक सिस्टम अपनाना
- रेड मीट का कम सेवन करना



