मध्यप्रदेश में मंत्री और अधिकारी अपने जिलों में सक्रिय नहीं, जिससे निगरानी कमजोर हुई। नियमित दौरे, रात्रि विश्राम और समीक्षा से शासन प्रभावी बन सकता है।
मध्यप्रदेश में जब डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में सरकार का गठन हुआ, तब शासन-प्रशासन की कार्यशैली को अधिक जनोन्मुखी और जवाबदेह बनाने की बात प्रमुखता से कही गई थी। इसी सोच के तहत मुख्यमंत्री ने मंत्रियों और अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश दिए थे कि वे अपने प्रभार वाले जिलों का नियमित दौरा करें, वहां रात्रि विश्राम करें, गांवों में रुककर आम जनता और कार्यकर्ताओं से संवाद करें तथा प्रशासनिक बैठकों के माध्यम से विकास कार्यों की समीक्षा करें। मुख्यमंत्री की मंशा साफ थी कि शासन की योजनाओं का लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे और जमीनी स्तर पर समस्याओं का त्वरित समाधान हो सके।
लेकिन पिछले लगभग 18 महीनों के दौरान सामने आ रही चर्चाओं और आंकड़ों से यह संकेत मिलता है कि मुख्यमंत्री की इस भावना का अपेक्षित स्तर पर पालन नहीं हो पाया है। कई मंत्री ऐसे बताए जा रहे हैं जिन्होंने अपने प्रभार वाले जिलों में न तो नियमित दौरे किए और न ही वहां रात्रि विश्राम या व्यापक समीक्षा बैठकों में रुचि दिखाई। इससे शासन की निगरानी व्यवस्था पर भी सवाल उठने लगे हैं।
प्रदेश में प्रभार मंत्री व्यवस्था का उद्देश्य यह था कि हर जिले के लिए एक जिम्मेदार मंत्री नियुक्त किया जाए, जो वहां के प्रशासनिक कामकाज पर सीधी निगरानी रखे। मंत्री समय-समय पर जिले का दौरा करें, विभागीय अधिकारियों के साथ बैठक करें, योजनाओं की प्रगति की समीक्षा करें और स्थानीय समस्याओं को समझकर समाधान की दिशा में पहल करें। इसके साथ ही मुख्यमंत्री ने यह भी कहा था कि मंत्री और अधिकारी गांवों में जाकर रात्रि विश्राम करें। इसका उद्देश्य केवल औपचारिक दौरा नहीं, बल्कि वास्तविक स्थिति को समझना था। जब कोई मंत्री या वरिष्ठ अधिकारी गांव में रुकता है, तो उसे वहां की समस्याओं, सुविधाओं और जनता की अपेक्षाओं का सीधा अनुभव होता है। इससे निर्णय अधिक व्यावहारिक और प्रभावी बन सकते हैं।
हालांकि, बीते डेढ़ वर्ष में कई प्रमुख मंत्रियों की सक्रियता पर सवाल उठे हैं। उदाहरण के तौर पर उपमुख्यमंत्री जगदीश देवड़ा के बारे में चर्चा है कि उन्होंने अपने प्रभार वाले जबलपुर जिले में अब तक केवल दो बार रात्रि विश्राम किया और एक ही प्रमुख बैठक ली। इसी प्रकार उपमुख्यमंत्री राजेंद्र शुक्ला ने भी अपने प्रभार वाले शहडोल जिले में सीमित दौरे किए और केवल दो बार रात्रि विश्राम तथा बैठक की जानकारी सामने आई है।
इसी तरह वरिष्ठ मंत्री कैलाश विजयवर्गीय के बारे में कहा जा रहा है कि उन्होंने अपने प्रभार वाले धार जिले में अभी तक रात्रि विश्राम नहीं किया। वहीं राकेश सिंह ने नर्मदापुरम जिले में अभी तक कोई बड़ी समीक्षा बैठक नहीं ली है। इसी प्रकार प्रहलाद पटेल के बारे में चर्चा है कि उन्होंने भिंड जिले में केवल दो बार रात्रि विश्राम किया है। यदि इन चर्चाओं में तथ्यात्मक आधार है, तो यह निश्चित रूप से चिंताजनक स्थिति कही जा सकती है।
किसी भी जिले में शासन की सक्रियता काफी हद तक इस बात पर निर्भर करती है कि वहां के प्रभारी मंत्री और वरिष्ठ अधिकारी कितने सक्रिय हैं। जब मंत्री नियमित दौरे करते हैं और बैठकों के माध्यम से अधिकारियों से जवाबदेही तय करते हैं, तो प्रशासनिक तंत्र भी अधिक सतर्क रहता है।
लेकिन यदि मंत्री ही अपने प्रभार वाले जिलों में कम जाते हैं, तो इसका सीधा असर प्रशासनिक व्यवस्था पर पड़ता है। अधिकारी भी उतनी गंभीरता से योजनाओं की समीक्षा नहीं करते। कलेक्टर, एसपी और अन्य विभागीय अधिकारी तभी अधिक सक्रिय होते हैं, जब उन्हें पता हो कि मंत्री स्तर पर नियमित मॉनिटरिंग हो रही है।
यही कारण है कि कई बार जिलों में व्यवस्थाओं के गड़बड़ाने की शिकायतें सामने आती हैं। योजनाओं का लाभ समय पर नहीं पहुंचता, विकास कार्यों की गति धीमी हो जाती है और जनता की समस्याएं लंबित रह जाती हैं।
सरकारी योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए सबसे महत्वपूर्ण तत्व मॉनिटरिंग यानी निगरानी है। यदि योजनाओं की नियमित समीक्षा नहीं होगी, तो उनका असर भी सीमित रह जाएगा। मुख्यमंत्री की मंशा भी यही थी कि मंत्री जिलों में जाकर जमीनी स्तर पर स्थिति की समीक्षा करें। जब मंत्री स्वयं गांवों में जाकर लोगों से मिलते हैं, तो उन्हें सीधे फीडबैक मिलता है। इससे यह भी पता चलता है कि योजनाएं वास्तव में जमीन पर कितनी प्रभावी हैं। लेकिन यदि यह प्रक्रिया कमजोर पड़ती है, तो शासन और जनता के बीच दूरी बढ़ने लगती है।
किसी भी सरकार की सफलता केवल मुख्यमंत्री की सक्रियता से नहीं होती, बल्कि पूरे मंत्रिमंडल की सामूहिक जिम्मेदारी से होती है। मुख्यमंत्री नीति और दिशा तय करते हैं, लेकिन उसे जमीन पर लागू करने की जिम्मेदारी सभी मंत्रियों और अधिकारियों की होती है।
यदि मुख्यमंत्री ने स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि मंत्री अपने प्रभार वाले जिलों में जाएं, रात्रि विश्राम करें और बैठकों के माध्यम से योजनाओं की समीक्षा करें, तो उसका पालन करना पूरे मंत्रिमंडल की जिम्मेदारी बनती है।
प्रदेश में प्रशासनिक व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाने के लिए शीर्ष स्तर से कड़ाई और अनुशासन भी जरूरी होता है। यदि मंत्री और अधिकारी मुख्यमंत्री के निर्देशों का गंभीरता से पालन करें, तो निश्चित रूप से शासन की योजनाओं का लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुंच सकता है। डॉ. मोहन यादव सरकार की कई जनकल्याणकारी योजनाएं प्रदेश में संचालित हो रही हैं। इन योजनाओं का वास्तविक लाभ तभी मिल सकता है, जब उनकी निगरानी मजबूत हो और जमीनी स्तर पर सक्रियता दिखाई दे। यह कहना गलत नहीं होगा कि यदि प्रभार मंत्री नियमित रूप से जिलों का दौरा करें, गांवों में रुकें, जनता और कार्यकर्ताओं से संवाद करें और प्रशासनिक बैठकों के माध्यम से कार्यों की समीक्षा करें, तो शासन की प्रभावशीलता कई गुना बढ़ सकती है। यही वह रास्ता है, जिससे सरकार की योजनाएं अंतिम व्यक्ति तक पहुंचेंगी और सुशासन की अवधारणा मजबूत होगी।