संपादकीय
28 Feb, 2026

मुख्यमंत्री के निर्देशों की अनदेखी: वल्लभ भवन की कुर्सियाँ खाली, जवाबदेही भी गायब

वल्लभ भवन में अधिकारियों की अनुपस्थिति से मुख्यमंत्री निर्देशों की अनदेखी उजागर, प्रशासनिक जवाबदेही, अनुशासन और समयपालन व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हुए।

मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव लगातार प्रशासनिक कसावट, समयबद्ध उपस्थिति और जवाबदेही की बात कर रहे हैं। बैठकों में स्पष्ट निर्देश दिए जा रहे हैं कि मंत्रालय जनता के लिए है और अधिकारी समय पर उपस्थित रहकर समस्याओं का समाधान सुनिश्चित करें। लेकिन जब राजधानी के वल्लभ भवन में औचक निरीक्षण के दौरान सुबह 10:30 बजे कई विभागों के प्रमुख सचिव, सचिव और वरिष्ठ अधिकारी अपनी कुर्सियों से नदारद पाए जाएँ, तो यह केवल लापरवाही नहीं—यह शासन व्यवस्था के प्रति खुली अवहेलना है।
खेल, कृषि, गृह, उद्योग, सामान्य प्रशासन, वित्त, स्कूल शिक्षा, राजस्व और स्वास्थ्य—लगभग हर महत्वपूर्ण विभाग में उच्च स्तर के अधिकारी अनुपस्थित मिले। यह अनुपस्थिति महज़ “मीटिंग” का बहाना बनकर रह गई। सवाल यह है कि आखिर वह कौन-सी मीटिंग है, जिसका स्थान, समय और उद्देश्य तक स्पष्ट नहीं? क्या मंत्रालय की प्राथमिकता जनता से मिलना और उनकी समस्याएँ सुनना नहीं है?
प्रदेश भर से नागरिक मंत्रालय में अपनी शिकायतें लेकर आते हैं। कोई किसान मुआवज़े की आस में, कोई युवा नियुक्ति आदेश के लिए, कोई शिक्षक स्थानांतरण की गुहार लेकर, तो कोई उद्योगपति स्वीकृति के लिए। वे घंटों प्रतीक्षा करते हैं—11 बजे, 12 बजे, 1 बजे तक। कई बार पूरा दिन बीत जाता है, लेकिन जिन अधिकारियों से समाधान की उम्मीद होती है, वे अपने कक्ष में दिखाई ही नहीं देते। जब प्रमुख सचिव ही अनुपस्थित हों, तो अधीनस्थ कर्मचारियों से जवाबदेही की अपेक्षा कैसे की जा सकती है?
यह स्थिति केवल प्रशासनिक शिथिलता नहीं, बल्कि जनविश्वास पर प्रहार है। मंत्रालय शासन का मस्तिष्क होता है। यदि मस्तिष्क ही सुस्त पड़े, तो पूरे तंत्र में जड़ता आना स्वाभाविक है। मुख्यमंत्री के स्पष्ट निर्देशों के बाद भी यदि वरिष्ठ अधिकारी समयपालन और उपस्थिति को गंभीरता से नहीं लेते, तो यह संदेश जाता है कि आदेश केवल कागज़ों तक सीमित हैं।
सरकारी सेवा कोई विशेषाधिकार नहीं, यह दायित्व है। वेतन, सुविधाएँ और अधिकार इसलिए दिए जाते हैं कि जनता को समय पर न्याय और सेवा मिल सके। लेकिन जब अधिकारी अपनी ही जिम्मेदारियों से विमुख हो जाएँ, तो यह व्यवस्था को खोखला करने जैसा है। औचक निरीक्षण ने यह उजागर कर दिया है कि मंत्रालय में अनुशासन की दरारें कितनी गहरी हैं।
अब प्रश्न यह नहीं कि कौन अनुपस्थित था; प्रश्न यह है कि अनुपस्थिति की यह संस्कृति कब तक चलेगी? यदि मुख्यमंत्री स्वयं कड़े रुख का संकेत दे चुके हैं, तो प्रशासनिक शीर्ष पर बैठे अधिकारियों को यह समझ लेना चाहिए कि समय बदल चुका है। “मीटिंग में हैं” जैसे बहाने अब स्वीकार्य नहीं होंगे। हर अधिकारी को अपनी उपस्थिति, कार्यप्रणाली और निर्णयों का स्पष्ट लेखा-जोखा देना होगा।
जरूरत है एक सख्त प्रणाली की—बायोमेट्रिक उपस्थिति का कड़ाई से पालन, मीटिंग शेड्यूल का सार्वजनिक रिकॉर्ड और अनुपस्थित पाए जाने पर तत्काल जवाबदेही तय करना। केवल चेतावनी नहीं, बल्कि दंडात्मक कार्रवाई भी आवश्यक है। जब तक उदाहरण प्रस्तुत नहीं किए जाएँगे, तब तक व्यवस्था में सुधार की उम्मीद करना व्यर्थ होगा।
मुख्यमंत्री का कड़ा रुख स्वागतयोग्य है, परंतु उसे जमीनी परिणामों में बदलना अब प्रशासनिक तंत्र की जिम्मेदारी है। वल्लभ भवन की खाली कुर्सियाँ यह संकेत दे रही हैं कि आदेश और अमल के बीच खाई अब भी बनी हुई है। यदि यह खाई पाटनी है, तो अधिकारियों को यह याद रखना होगा कि वे जनता के सेवक हैं, सत्ता के स्वामी नहीं।
मंत्रालय के गलियारों में अनुशासन की दस्तक सुनाई दे रही है। अब देखना यह है कि जिम्मेदार पदों पर बैठे अधिकारी इसे चेतावनी मानते हैं या फिर एक और औपचारिकता समझकर अनसुना कर देते हैं। यदि सुधार नहीं हुआ, तो यह केवल प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक जवाबदेही की हार मानी जाएगी।
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