संपादकीय
09 Mar, 2026

बिजली कंपनियों का घाटा या प्रबंधन की नाकामी उपभोक्ताओं पर बोझ डालने की पुरानी चाल

मध्य प्रदेश की बिजली कंपनियों के लगातार घाटे और प्रबंधन की कमियों ने उपभोक्ताओं पर बोझ बढ़ा दिया है। सुधार, खर्च नियंत्रण और बिजली चोरी रोकने के बिना दरें बढ़ाना न्यायसंगत नहीं है।

मध्य प्रदेश की बिजली वितरण कंपनियों का हाल एक ऐसे घर की तरह हो गया है, जहाँ कमाने वाले से ज्यादा खर्च करने वाले बैठे हों और हर बार घाटे का ठीकरा उसी के सिर फोड़ दिया जाता हो, जो ईमानदारी से अपना हिस्सा निभा रहा है। प्रदेश की तीनों बिजली वितरण कंपनियाँ पिछले कई वर्षों से घाटे का रोना रो रही हैं। लेकिन सवाल यह है कि यह घाटा वास्तव में आर्थिक मजबूरी है या फिर प्रबंधन की अक्षमता, लापरवाही और मिलीभगत का नतीजा है।
आज स्थिति यह बन गई है कि बिजली कंपनियाँ अपनी कमियों को दूर करने की बजाय आम उपभोक्ताओं का गला घोंटने की तैयारी में लगी हुई हैं। नौ वर्षों से लगातार घाटे का हवाला देकर बिजली दरें बढ़ाने की सिफारिशें की जाती रही हैं। लेकिन कोई यह पूछने वाला नहीं है कि आखिर कंपनियाँ अपने खर्चों को कम करने के लिए क्या कर रही हैं, बिजली चोरी रोकने के लिए क्या कदम उठा रही हैं और बड़े बकायेदारों से वसूली क्यों नहीं कर पा रही हैं।
विधानसभा में पूछे गए एक सवाल के जवाब में तीनों बिजली कंपनियों की वित्तीय स्थिति का जो सच सामने आया, वह चौंकाने वाला है। आंकड़ों के अनुसार पिछले नौ वर्षों में तीनों कंपनियों को मिलाकर लगभग 34,561 करोड़ रुपये का घाटा हुआ है। इनमें पश्चिम क्षेत्र विद्युत वितरण कंपनी को 16,188.48 करोड़ रुपये, मध्य क्षेत्र विद्युत वितरण कंपनी को 3,767 करोड़ रुपये और पूर्व क्षेत्र विद्युत वितरण कंपनी को 14,605.88 करोड़ रुपये का घाटा हुआ है।
ये आंकड़े सिर्फ वित्तीय कमजोरी नहीं, बल्कि पूरे प्रबंधन तंत्र की विफलता को उजागर करते हैं। सवाल यह है कि यदि नौ वर्षों से कंपनियाँ घाटे में हैं तो क्या उन्होंने अपनी कार्यप्रणाली में सुधार के लिए कोई ठोस कदम उठाए? या फिर हर बार घाटे का हवाला देकर जनता पर बिजली दरों का बोझ डाल देना ही उनकी नीति बन चुकी है।
बिजली कंपनियों का एक अजीब सा चलन बन गया है। पहले घाटे के बड़े-बड़े आंकड़े पेश किए जाते हैं, फिर उसी आधार पर नियामक आयोग से बिजली दरें बढ़ाने की मांग की जाती है। यह सिलसिला वर्षों से चलता आ रहा है। हालांकि पश्चिम क्षेत्र बिजली वितरण कंपनी के हालिया आंकड़े इस पूरी कहानी को संदेह के घेरे में ला देते हैं। यदि पिछले चार वित्तीय वर्षों पर नजर डालें तो 2021 से 2024 के बीच कंपनी को क्रमशः लगभग 1709 करोड़, 1130 करोड़ और 125 करोड़ रुपये का घाटा बताया गया। लेकिन अचानक 2024-25 में यही कंपनी 730 करोड़ रुपये के लाभ में पहुँच गई।
यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि जो कंपनी लगातार घाटे में थी, वह अचानक लाभ में कैसे आ गई? क्या प्रबंधन में कोई चमत्कार हुआ या फिर पहले के घाटे के आंकड़ों में ही कुछ ऐसा था, जिसे सही तरीके से परखा नहीं गया।
सबसे बड़ी समस्या यह है कि बिजली कंपनियाँ अपने खर्चों को नियंत्रित करने की दिशा में गंभीर नजर नहीं आतीं। प्रबंधन की लग्जरी जीवनशैली, कॉरपोरेट संस्कृति और अनावश्यक प्रशासनिक खर्चों पर कोई अंकुश नहीं दिखता। यदि किसी संस्था को लगातार घाटा हो रहा हो तो सबसे पहले उसके खर्चों की समीक्षा की जाती है। अनावश्यक खर्च कम किए जाते हैं, कार्यक्षमता बढ़ाई जाती है और संसाधनों का बेहतर उपयोग किया जाता है। लेकिन बिजली कंपनियों के मामले में ऐसा कुछ भी दिखाई नहीं देता। कंपनियाँ घाटे की चर्चा तो करती हैं, लेकिन यह नहीं बतातीं कि उन्होंने अपने खर्चों में कितनी कटौती की और कितनी दक्षता बढ़ाई।
घाटे का एक बड़ा कारण बिजली चोरी भी है। प्रदेश में हजारों ऐसे उपभोक्ता हैं जो खुलेआम चोरी की बिजली जलाते हैं। कई जगहों पर तो यह स्थिति लगभग सामान्य हो चुकी है। लेकिन बिजली कंपनियों की कार्रवाई अक्सर कमजोर और औपचारिक ही नजर आती है। चोरी रोकने के लिए सख्त अभियान, तकनीकी निगरानी और नियमित कार्रवाई की जरूरत होती है, लेकिन इसमें अपेक्षित गंभीरता दिखाई नहीं देती। विडंबना यह है कि जो लोग मुफ्त में बिजली जलाते हैं उनकी संख्या लगातार बढ़ रही है, जबकि जो उपभोक्ता ईमानदारी से बिल जमा करते हैं, उन्हीं पर दरों का बोझ बढ़ा दिया जाता है।
एक और गंभीर समस्या बड़े बकायेदारों की है। करोड़ों रुपये के बकाये कई बड़े उद्योगों, संस्थानों और प्रभावशाली उपभोक्ताओं पर लंबित हैं। सवाल यह है कि जब आम उपभोक्ता का छोटा सा बिल भी बकाया होने पर तुरंत नोटिस, जुर्माना और कनेक्शन काटने की कार्रवाई हो जाती है, तो फिर बड़े बकायेदारों के मामले में इतनी नरमी क्यों दिखाई जाती है। यदि कंपनियाँ इन बड़े बकायेदारों से शत-प्रतिशत वसूली कर लें तो घाटे का बड़ा हिस्सा स्वतः कम हो सकता है। लेकिन ऐसा करने के बजाय बार-बार आम उपभोक्ताओं को ही आसान लक्ष्य बनाया जाता है।
प्रदेश में लगभग पौने दो करोड़ उपभोक्ता बिजली सेवाओं से जुड़े हुए हैं। इनमें से अधिकांश नियमित रूप से अपना बिल जमा करते हैं। लेकिन हर बार जब बिजली कंपनियाँ घाटे का हवाला देती हैं, तो उसका सीधा असर इन्हीं उपभोक्ताओं पर पड़ता है। दरें बढ़ती हैं, सरचार्ज बढ़ते हैं और नए-नए शुल्क जोड़ दिए जाते हैं। यह स्थिति उस व्यक्ति के साथ अन्याय है, जो पहले से ही महंगाई, करों और बढ़ती जीवन लागत से जूझ रहा है।
अब सबसे महत्वपूर्ण भूमिका विद्युत नियामक आयोग की है। आयोग का काम सिर्फ कंपनियों की सिफारिशों को स्वीकार करना नहीं, बल्कि उनके पीछे की वास्तविकता की गहराई से जांच करना भी है। आयोग को यह देखना होगा कि कंपनियों ने खर्च कम करने के लिए क्या कदम उठाए, बिजली चोरी रोकने के लिए क्या रणनीति अपनाई और बड़े बकायेदारों से वसूली क्यों नहीं हो रही। यदि इन सवालों का संतोषजनक उत्तर नहीं मिलता, तो केवल घाटे के आधार पर बिजली दरें बढ़ाने की अनुमति देना न्यायसंगत नहीं होगा।
बिजली क्षेत्र में सुधार की जरूरत अब टाली नहीं जा सकती। इसके लिए कुछ सख्त कदम जरूरी हैं—बिजली चोरी पर कठोर कार्रवाई, बड़े बकायेदारों से शत-प्रतिशत वसूली, कंपनियों के प्रशासनिक खर्चों में कटौती और प्रबंधन की जवाबदेही तय करना। जब तक ये कदम नहीं उठाए जाते, तब तक घाटे का यह चक्र चलता रहेगा और हर बार उसका बोझ आम जनता पर डाला जाता रहेगा।
बिजली कंपनियों का घाटा सिर्फ आर्थिक आंकड़ा नहीं, बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही का सवाल है। यदि कंपनियाँ अपनी कमियों को दूर करने की बजाय हर बार उपभोक्ताओं की जेब पर बोझ डालने की कोशिश करेंगी, तो यह व्यवस्था पर सवाल खड़े करेगा। समय आ गया है कि घाटे के नाम पर जनता को डराने और बिजली दरें बढ़ाने की परंपरा पर रोक लगे। पहले कंपनियाँ अपने घर को व्यवस्थित करें, चोरी रोकें, बकाया वसूलें और खर्च कम करें। तभी यह कहा जा सकेगा कि बिजली कंपनियाँ वास्तव में जनता की सेवा के लिए काम कर रही हैं, न कि अपनी नाकामियों का बोझ जनता के कंधों पर डालने के लिए।
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आज का राशिफल

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