नागपुर, 28 फरवरी 2026।
स्वाधीनता सेनानियों के योगदान को कम करके दिखाने का आरोप लगाते हुए कई सामाजिक, साहित्यिक और पत्रकारिता क्षेत्र से जुड़े लोगों ने विधानमंडल के पीठासीन अधिकारियों को संशोधन की मांग करते हुए याचिका सौंपी है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि 1857 का संघर्ष केवल विद्रोह नहीं बल्कि देश की आजादी के लिए लड़ा गया पहला सशस्त्र स्वाधीनता संग्राम था।
याचिका में कहा गया है कि 1857 के संघर्ष को इतिहास में उचित सम्मान दिया जाना चाहिए। इस संदर्भ में विनायक दामोदर सावरकर की पुस्तक ‘1857 चे स्वातंत्र्यसमर’ का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि इसमें इस संघर्ष को स्पष्ट रूप से स्वतंत्रता संग्राम बताया गया है। याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि विश्वकोश के अलग-अलग खंडों में इस ऐतिहासिक घटना को अलग-अलग नामों से उल्लेखित किया गया है, जिससे ऐतिहासिक तथ्यों के साथ अन्याय हो रहा है।
याचिका में रानी लक्ष्मीबाई, नाना साहेब और तात्या टोपे जैसे महान स्वाधीनता सेनानियों का एकवचन में उल्लेख किए जाने पर भी आपत्ति दर्ज कराई गई है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि इन वीर सेनानियों का उल्लेख सम्मानजनक और उचित ऐतिहासिक संदर्भ में किया जाना चाहिए। झांसी की रानी के शौर्य और तात्या टोपे के बलिदान का उल्लेख वसंत वरखेडकर की कृति ‘सत्तावनचा सेनानी’ में भी विस्तार से किया गया है।
वरिष्ठ पत्रकार अविनाश पाठक के नेतृत्व में यह याचिका महाराष्ट्र विधानसभा अध्यक्ष राहुल नार्वेकर तथा विधान परिषद के सभापति राम शिंदे को सौंपी गई है। याचिका की प्रतियां मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस, उपमुख्यमंत्री सुनेत्रा पवार, उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे तथा मराठी भाषा मंत्री उदय सामंत को भी भेजी गई हैं। याचिका के साथ विश्वकोश के संबंधित पृष्ठों की छायाप्रतियां भी संलग्न की गई हैं।
याचिकाकर्ताओं ने मांग की है कि आगामी संस्करणों और आधिकारिक वेबसाइट पर संशोधन करते हुए 1857 के संघर्ष को स्पष्ट रूप से स्वाधीनता संग्राम के रूप में दर्ज किया जाए। उन्होंने कहा कि ऐतिहासिक घटनाओं के नाम और संदर्भ में परिवर्तन राष्ट्रीय स्वाभिमान को ठेस पहुंचाने जैसा है। इस मामले में राज्य सरकार और विधानमंडल के निर्णय पर सभी की निगाहें टिकी हुई हैं।



