बुनाई न केवल बुजुर्गों का शौक रही है बल्कि अब इसे किसी भी उम्र के लोगों के लिए मानसिक स्वास्थ्य में मददगार साधन माना जाने लगा है। यह सस्ती और आसानी से सीखी जा सकने वाली गतिविधि नाखून चबाने, डूमस्क्रॉलिंग और यहां तक कि स्ट्रीट ड्रग्स जैसी बुरी आदतों को छोड़ने में मदद कर सकती है। इसके अलावा इसका एकमात्र साइड-इफेक्ट बहुत सारे स्कार्फ़ और टोपी बनाना हो सकता है।
पर्सनल अनुभव और शुरुआती वैज्ञानिक अध्ययन यह दर्शाते हैं कि बुनाई और इसकी सिस्टर क्रोशे इमोशनल रेगुलेशन को बेहतर बनाने में कारगर हैं। इससे लोग अपने नेगेटिव इमोशंस को प्रोसेस कर सकते हैं और लत को छोड़ने में मदद पा सकते हैं।
साइंटिफिक स्टडीज़ में पाया गया कि रेजिडेंशियल ट्रीटमेंट सेंटर्स में बुनाई करने वाले मरीज़ों ने अपने डिस्ट्रेस लेवल को कम करने में उल्लेखनीय सुधार दिखाया। ये मरीज़ फ़ुल-टाइम ट्रीटमेंट में रहते हैं, जिससे बुनाई सीखने और हेल्दी कोपिंग मैकेनिज्म अपनाने का पर्याप्त समय मिलता है।
विशेष रूप से ईटिंग डिसऑर्डर से जूझ रही युवा महिलाओं पर की गई स्टडी में लगभग 75 प्रतिशत प्रतिभागियों ने कहा कि बुनाई ने खाने से जुड़ी चिंता को कम करने में मदद की।
बुनाई का असर EMDR (आई मूवमेंट डिसेंसिटाइजेशन एंड रीप्रोसेसिंग) जैसी तकनीक के समान माना जाता है, जिसमें दोनों हेमिस्फ़ियर के सक्रिय होने से एंग्जायटी और PTSD को कम करने में मदद मिलती है। इसके लिए बुनाई में बहुत अच्छा होना आवश्यक नहीं है, बल्कि दोनों हाथों और दिमाग का संतुलित इस्तेमाल काफी है।
जो लोग किसी आदत या लत को छोड़ना चाहते हैं, उनके लिए बुनाई हैबिट रिप्लेसमेंट थेरेपी का हिस्सा बन सकती है। यह नकारात्मक इमोशंस को प्रोसेस करने और हाथों को व्यस्त रखने का एक प्रभावी तरीका है। कई बुनकर इसे "अपने दिमाग से निकलकर अपने हाथों में आने" का तरीका बताते हैं।
बुनाई के जरिए नुकसानदायक आदत की जगह एक हेल्दी और सुकून देने वाली एक्टिविटी अपनाई जा सकती है, जिससे मानसिक स्वास्थ्य और आत्म-नियंत्रण में सुधार होता है।



