नई दिल्ली, 12 मार्च 2026।
लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने गुरुवार को अध्यक्ष के आसन से सदन की मर्यादा और परंपराओं को बनाए रखने की आवश्यकता पर जोर दिया और कहा कि यह सभी सदस्यों की सामूहिक जिम्मेदारी है।
बिरला ने बताया कि उनके खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव बुधवार को ध्वनिमत से खारिज हुआ और इस पर दो दिनों तक 12 घंटे से अधिक चर्चा हुई। उनका प्रयास सदन में सभी सदस्यों को नियमों और प्रक्रियाओं के तहत अपने विचार व्यक्त करने का अवसर देना रहा।
उन्होंने कहा कि सदन समाज के अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति की आवाज बनता है और संविधान के अनुच्छेद 93 के तहत उन्हें दूसरी बार अध्यक्ष पद का दायित्व मिला। बिरला ने सदन की कार्यवाही को निष्पक्षता, अनुशासन और संतुलन के साथ संचालित करने पर जोर दिया।
उन्होंने सदस्यों को समझाया कि सदन नियमों से चलता है और ये नियम सभी पर समान रूप से लागू होते हैं। प्रधानमंत्री या मंत्रीगण को भी नियम 372 के तहत अध्यक्ष से अनुमति लेनी होती है। सदस्यों का कोई विशेष अधिकार नियमों से ऊपर नहीं है।
बिरला ने संसदीय परंपराओं का उदाहरण देते हुए बताया कि अटल बिहारी वाजपेयी ने 1957 में जम्मू-कश्मीर से संबंधित दस्तावेज़ सदन में रखने से पहले स्पीकर को दिखाया और उनका सम्मान किया। 1958 में भी बिना स्पीकर की अनुमति दस्तावेज़ सदन में नहीं रखे गए।
उन्होंने कहा कि अध्यक्ष के निर्णय से कोई सदस्य सहमत या असहमत हो सकता है, लेकिन नियमों और परंपराओं को लागू करना उनका कर्तव्य है। सदन की मर्यादा के विरुद्ध आचरण करने वाले सदस्यों के खिलाफ कठोर निर्णय लेना पड़ता है।
बिरला ने प्रतिपक्ष द्वारा माइक बंद करने के आरोपों को खारिज किया और बताया कि माइक केवल उस सदस्य का ऑन होता है जिसे बोलने की अनुमति दी जाती है। उन्होंने महिला सदस्यों के बोलने के पर्याप्त अवसर देने की बात भी कही।
सदन में नारेबाजी, पोस्टर दिखाना, कागज फाड़ना और बैनर लहराना लोकतांत्रिक परंपरा के विरुद्ध है। बिरला ने सदस्यों से अनुरोध किया कि वे सदन की मर्यादा और परंपराओं को बनाए रखने के लिए सामूहिक संकल्प लें और सहयोग करें।
उन्होंने जोर देकर कहा कि सदन और देश की जनता लोकतांत्रिक संस्थाओं में विश्वास रखती है, इसलिए सदन की गरिमा बनाए रखना सभी का दायित्व है। सदस्यों को मतभेद हो सकते हैं, लेकिन व्यवस्था बनाए रखना आवश्यक है।



