भारत की राजनीति में जब भी विचारों का दिवालियापन आता है, तब इतिहास की कब्रें खोदी जाती हैं और महापुरुषों की तस्वीरें ढाल बनाकर खड़ी कर दी जाती हैं। महापुरुषों को लेकर विवाद यूँ ही नहीं खड़े होते, वे योजनाबद्ध होते हैं। तुलना की आग में उनके योगदान को झोंक दिया जाता है और राजनीति की बलिवेदी पर चढ़ाकर उससे “शुभ-लाभ” अर्जित किया जाता है। यह संयोग नहीं, सुनियोजित ध्रुवीकरण का खेल है।
महाराष्ट्र के मालेगांव में टीपू सुल्तान की तस्वीर को लेकर उठा विवाद इसी प्रवृत्ति का ताजा उदाहरण है। नई महापौर द्वारा कार्यालय में उनका चित्र लगाने से शुरू हुआ मामला देखते-देखते छत्रपति शिवाजी महाराज से तुलना तक जा पहुँचा। एक पक्ष ने इसे अपनी आस्था और पहचान का प्रश्न बना लिया, तो दूसरे पक्ष ने इसे अपने नायक के अपमान से जोड़ दिया। विवाद का वास्तविक मुद्दा प्रशासन या विकास नहीं था; मुद्दा था भावनाओं को भड़काकर राजनीतिक लाभ उठाना।
भारतीय संस्कृति में ‘शुभ-लाभ’ का गहरा अर्थ है—सुख, समृद्धि और सकारात्मकता। लेकिन राजनीति ने इसे नया अर्थ दे दिया है। यहाँ शुभ-लाभ का मतलब है—ध्रुवीकरण और तुष्टीकरण। जिस तरह घरों की तिजोरी पर स्वास्तिक बनाकर मंगल की कामना की जाती है, उसी तरह चुनावी तिजोरी भरने के लिए महापुरुषों के नाम का इस्तेमाल किया जाता है। फर्क सिर्फ इतना है कि वहाँ आस्था है, यहाँ अवसरवाद।
इस देश में तो राम तक को विवाद का विषय बना दिया गया। अयोध्या में मंदिर निर्माण का प्रश्न केवल धार्मिक नहीं रहा; उसने भारतीय राजनीति की धुरी बदल दी। सदियों पुराना विवाद सत्ता परिवर्तन का माध्यम बन गया। आस्था की लहर ने राजनीतिक परिदृश्य को इस तरह बदला कि हिंदुत्व की राजनीति केंद्र की सत्ता तक पहुँच गई। जब यह सूत्र कारगर साबित हुआ, तब सभी दलों ने समझ लिया कि इतिहास और धर्म सबसे प्रभावी चुनावी हथियार हैं।
यदि पिछले कुछ दशकों के राजनीतिक विमर्श को खंगाला जाए, तो महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, भीमराव रामजी अंबेडकर, काशी, मथुरा, अयोध्या, बाबर, औरंगजेब और मनुस्मृति जैसे नाम सबसे अधिक उछाले गए विषय मिलेंगे। ये विमर्श अकादमिक बहस के लिए कम और चुनावी ध्रुवीकरण के लिए अधिक उपयोग में लाए गए। ब्राह्मणवाद, जातिवाद, बहुसंख्यकवाद और अल्पसंख्यकवाद—ये सभी शब्द अब वैचारिक नहीं, बल्कि राजनीतिक औजार बन चुके हैं।
टीपू सुल्तान बनाम शिवाजी की तुलना इतिहास का निष्पक्ष विश्लेषण नहीं, बल्कि भावनात्मक ध्रुवीकरण का शॉर्टकट है। इतिहास के हर पात्र के अपने समय, अपनी सीमाएँ और अपनी उपलब्धियाँ होती हैं। लेकिन राजनीति उन्हें श्वेत-श्याम में बाँट देती है—एक को खलनायक, दूसरे को महिमामंडित नायक। इससे न इतिहास का भला होता है, न समाज का; बस वोटों की फसल तैयार होती है।
विडंबना यह है कि जो दल महात्मा गांधी को अपना आदर्श बताते हैं, वही दूसरे दलों पर गांधी-विरोधी होने का आरोप लगाते हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर गांधी हत्या का ठप्पा लगाकर राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश की जाती है और नाथूराम गोडसे का नाम बार-बार उछाला जाता है। प्रश्न यह नहीं कि इतिहास की घटनाओं पर चर्चा क्यों हो; प्रश्न यह है कि क्या हर चर्चा का उद्देश्य चुनावी गणित होना चाहिए।
इसी प्रकार भीमराव रामजी अंबेडकर और वल्लभभाई पटेल को लेकर भी राजनीति कम नहीं हुई। एक दल दूसरे पर आरोप लगाता है कि वह अंबेडकर-विरोधी है, तो दूसरा पटेल की विरासत का ठेकेदार बन बैठता है। स्मारक, प्रतिमाएँ और जयंती समारोह—इन सबके पीछे वैचारिक प्रतिबद्धता कम और राजनीतिक संदेश अधिक दिखाई देता है। सवाल यह है कि क्या महापुरुषों की विरासत को केवल प्रतीकों तक सीमित कर देना ही उनका सम्मान है।
देश के अधिकांश विवाद धर्म और जाति की जमीन पर खड़े दिखाई देते हैं। मुगल आक्रांताओं को लेकर बहस हो या मनुस्मृति पर आरोप-प्रत्यारोप—हर मुद्दा वोट बैंक की गणना से जुड़ जाता है। भारत का सामान्य मुसलमान अपनी रोजी-रोटी और बच्चों के भविष्य में अधिक रुचि रखता है, न कि मुगल बादशाहों को अपना आदर्श बनाने में। उसी तरह अधिकांश हिंदू भी अपने जीवन की समस्याओं का समाधान चाहते हैं, न कि सदियों पुराने घाव कुरेदना। लेकिन राजनीतिक ठेकेदारों को वर्तमान की समस्याएँ कम और अतीत की परछाइयाँ अधिक लुभाती हैं।
इतिहास के अच्छे और बुरे दोनों पक्ष होते हैं। इतिहास लेखन पर मतभेद स्वाभाविक हैं। परंतु जब हर मतभेद को सामाजिक टकराव में बदला जाए, तो यह प्रगतिशील समाज के लिए घातक है। महापुरुषों की तुलना से समाज में कटुता बढ़ती है, संवाद नहीं। यह एक ऐसा खेल है जिसमें जीत किसी की नहीं होती, हार केवल राष्ट्र की होती है।
आज जरूरत इस बात की है कि हम महापुरुषों को राजनीति की रणभूमि से निकालकर विचार की प्रयोगशाला में रखें। उनके जीवन से प्रेरणा लें, पर उन्हें चुनावी पोस्टर न बनाएँ। तुलनावाद की राजनीति लंबे समय तक किसी भी दल के लिए शुभ-मंगल साबित नहीं हो सकती। सत्ता मिल भी जाए, तो समाज में दरारें इतनी गहरी हो जाती हैं कि उन्हें पाटना कठिन हो जाता है।
हर राजनीतिक दल और नेता का वास्तविक मूल्यांकन उसके कार्य से होना चाहिए—उसने शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और सामाजिक समरसता के लिए क्या किया। यही उसका सच्चा शुभ और लोकमंगल है। यदि राजनीतिक लाभ का लोभ राष्ट्रहित पर भारी पड़ता रहा, तो इतिहास हमें माफ नहीं करेगा।
महापुरुषों को लेकर विवाद खड़ा करना आसान है; उनके आदर्शों पर चलना कठिन। राजनीति को तय करना होगा कि वह आसान रास्ता चुनेगी या कठिन, क्योंकि अंततः राष्ट्र की आत्मा वोट बैंक से बड़ी होती है और इतिहास की प्रतिष्ठा किसी भी चुनावी जीत से कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण होती है।