20 फरवरी।
आशीष मॉल की फिल्म 'शतक' पारंपरिक कमर्शियल सिनेमा से हटकर एक गंभीर और विचारशील विषय को परदे पर लाती है, जो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एक सदी लंबे सफर को दर्शाती है और दर्शक को केवल घटनाओं तक सीमित नहीं रखती बल्कि विचारधारा की यात्रा समझने का अवसर भी देती है।
कहानी में फिल्म आरएसएस की शुरुआत से लेकर बड़े संगठन बनने तक की यात्रा को सरल भाषा में पेश करती है। केशव बलीराम हेडगेवार को एक आम इंसान के रूप में दिखाया गया है, जिनकी सोच असाधारण थी, वहीं माधव सदाशिव गोलवलकर के दौर में संघर्ष और टोन अधिक गंभीर हो जाता है। महात्मा गांधी की हत्या के बाद लगे प्रतिबंधों वाला हिस्सा फिल्म को भावनात्मक और गंभीर बनाता है।
निर्देशन की बात करें तो आशीष मॉल ने फिल्म को संतुलित ढंग से प्रस्तुत किया है, ओवरड्रामैटिक होने से बचाते हुए कहानी को सहजता से आगे बढ़ाया है। लाइव-एक्शन और विजुअल इफेक्ट्स का संयोजन कई दृश्यों को प्रभावशाली बनाता है, हालांकि कुछ जगह गति थोड़ी धीमी लगती है।
लेखन में नितिन सावंत, रोहित गहलोत और उत्सव दान की लेखनी फिल्म को बोझिल नहीं होने देती। अनिल धनपत अग्रवाल का कॉन्सेप्ट स्पष्ट नजर आता है और फिल्म कई जगह भावनात्मक जुड़ाव भी पैदा करती है, खासकर उन दृश्यों में जहां युवा अपने घर छोड़कर बड़े उद्देश्य की ओर बढ़ते हैं।
कृधान मीडियाटेक के बैनर तले बनी फिल्म की प्रोडक्शन क्वालिटी मजबूत है और वीर कपूर का सपोर्ट साफ दिखता है। बैकग्राउंड स्कोर कहानी के मूड को सपोर्ट करता है, हालांकि म्यूजिक फिल्म का सबसे मजबूत पक्ष नहीं बन पाता।
'शतक' एक अलग तरह का सिनेमाई अनुभव है, जो दर्शक को सोचने पर मजबूर करता है और इतिहास, विचारधारा और सामाजिक बदलाव को समझने में रुचि रखने वालों के लिए यह फिल्म जरूर देखी जानी चाहिए।



