“दिया तले अंधेरा” कहावत शायद इसी दिन के लिए बनी थी। एक ओर पर्यावरण संरक्षण की लंबी-चौड़ी बातें, दूसरी ओर भोपाल की जीवनरेखा बड़ा तालाब का निर्मम दोहन। कागजों में सख्ती, जमीन पर सन्नाटा। सवाल सीधा है—क्या प्रशासन ने आंखों पर पट्टी बांध ली है या फिर यह सब मिलीभगत का सुनियोजित खेल है?
तालाब के चारों ओर 1300 से अधिक अतिक्रमण प्रशासन की सूची में दर्ज हैं। 1000 से ज्यादा इमारतें खड़ी हो चुकी हैं। 25 से अधिक मैरिज गार्डन और आलीशान भवन खुलेआम तालाब के किनारे शादियों की रोशनी में जहर घोल रहे हैं। नोटिस जारी होते हैं, फाइलें घूमती हैं, चेतावनी दी जाती है—और फिर सब कुछ ठंडे बस्ते में। क्या यह कानून का मजाक नहीं है?
राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) और न्यायालयों के स्पष्ट निर्देश हैं कि जलस्रोतों के कैचमेंट एरिया में किसी भी प्रकार का निर्माण प्रतिबंधित है। लेकिन यहां तो कैचमेंट एरिया में कॉलोनियां तन गईं, बड़े-बड़े बंगले खड़े हो गए, फार्महाउस बन गए। नौकरशाहों और जनप्रतिनिधियों के आलीशान ठिकाने भी इसी दायरे में पाए जाते हैं। जब रखवाले ही नियम तोड़ें, तो फिर आम आदमी से क्या अपेक्षा की जाए?
तालाब की भराव क्षमता 25.90 अरब लीटर घट चुकी है। 65 स्थानों पर भारी मात्रा में गाद जमा है। 40 नालों का 24 से 50 करोड़ लीटर सीवेज रोज सीधे तालाब में मिल रहा है। ये आंकड़े सिर्फ चेतावनी नहीं, विनाश का शंखनाद हैं। नयापुरा क्षेत्र से अवैध ड्रेनेज लाइन बिछाकर सीवेज सीधे तालाब में गिराया जा रहा है। वीआईपी रोड के पीछे, सूरज नगर, हलालपुर, सलीम की चक्की रोड और गोरबंद जैसे इलाकों में 200 से अधिक निर्माण तालाब की सीमा को पाटकर खड़े कर दिए गए और प्रशासन “अनजान” बना रहा।
अतिक्रमण अब झोपड़ियों तक सीमित नहीं है। यह एक संगठित सिंडिकेट का खेल है। पहले माफिया तालाब किनारे की जमीन पर मलबा डालते हैं, उसे समतल करते हैं और फिर रातों-रात बाउंड्री वॉल खड़ी कर देते हैं। खटलापुरा क्षेत्र में ही 45 से अधिक पक्के निर्माण तालाब की सीमा के भीतर खड़े हैं। यह सब प्रशासन की नाक के नीचे हुआ। क्या यह महज लापरवाही है या संरक्षण प्राप्त अपराध?
नगर निगम और जिला प्रशासन की भूमिका सबसे ज्यादा सवालों के घेरे में है। 300 से अधिक लोगों को नोटिस दिए गए, 1300 अतिक्रमण चिन्हित हैं, पर कार्रवाई शून्य है। शादी गार्डनों को पहले भी कई नोटिस दिए गए, लेकिन शादियों का धंधा धड़ल्ले से जारी है। मौखिक अनुमति कौन देता है? किसके इशारे पर करोड़ों का कारोबार तालाब की कीमत पर फल-फूल रहा है?
भोपाल का बड़ा तालाब सिर्फ पानी का स्रोत नहीं, यह शहर की सांस है, पहचान है, संस्कृति है। अगर इसकी भराव क्षमता यूं ही घटती रही, सीवेज यूं ही गिरता रहा और अतिक्रमण यूं ही बढ़ते रहे, तो आने वाले वर्षों में भोपाल को जल संकट का सामना करना पड़ेगा। तब प्रशासनिक फाइलें प्यास नहीं बुझा पाएंगी।
यह वक्त खानापूर्ति का नहीं, कठोर कार्रवाई का है। अवैध निर्माणों पर बुलडोजर चलना चाहिए, चाहे वे झोपड़ियां हों या आलीशान बंगले। कैचमेंट एरिया से हर अतिक्रमण हटाया जाए। सीवेज नालों को तत्काल डायवर्ट कर शोधन संयंत्रों से जोड़ा जाए। गाद हटाने के लिए व्यापक अभियान चलाया जाए और सबसे अहम—जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय हो।
वरना इतिहास गवाह रहेगा कि जब भोपाल का बड़ा तालाब दम तोड़ रहा था, तब प्रशासन नोटिसों की नौटंकी में व्यस्त था। “दिया तले अंधेरा” की यह तस्वीर अगर अब भी नहीं बदली, तो आने वाली पीढ़ियां पूछेंगी—क्या हमने अपनी ही जीवनदायिनी को स्वार्थ की बलि चढ़ा दिया?