प्रदेश के कई शहरों में लगातार हो रही आगजनी की घटनाएँ यह बताने के लिए पर्याप्त हैं कि हमारे प्रशासनिक तंत्र में अभी भी “प्यास लगने पर कुआँ खोदने” की परंपरा गहराई से मौजूद है। जब तक कोई बड़ी दुर्घटना नहीं हो जाती, तब तक न तो प्रशासन सक्रिय होता है और न ही व्यवस्थाओं को दुरुस्त करने की गंभीर कोशिश दिखाई देती है। लेकिन जैसे ही कोई भीषण अग्निकांड होता है, उसके बाद बैठकों का दौर, सर्वेक्षण, फाइलों की आवाजाही और नई योजनाओं की घोषणाएँ शुरू हो जाती हैं। दुर्भाग्य यह है कि कुछ समय बाद सब कुछ फिर से पुराने ढर्रे पर लौट आता है।
हाल ही में प्रदेश के कई शहरों—ग्वालियर, भोपाल, इंदौर और अन्य स्थानों—में भीषण आगजनी की घटनाएँ सामने आई हैं। इन घटनाओं ने एक बार फिर अग्नि सुरक्षा व्यवस्थाओं की वास्तविकता उजागर कर दी है। शहरों की संकरी गलियाँ, अव्यवस्थित बाजार और बिना योजना के बने भवन आग की स्थिति में बड़ी चुनौती बन जाते हैं। कई स्थानों पर फायर ब्रिगेड की गाड़ियाँ घटनास्थल तक पहुँच ही नहीं पातीं। नतीजा यह होता है कि आग पर काबू पाने में देर हो जाती है और तब तक जान-माल का भारी नुकसान हो चुका होता है।
सबसे चिंताजनक बात यह है कि नगर निगम, फायर ब्रिगेड और संबंधित प्रशासनिक विभागों के पास इन समस्याओं का स्थायी समाधान करने की ठोस व्यवस्था नहीं दिखाई देती। जब भी कोई बड़ी दुर्घटना होती है, तब प्रशासनिक अमला सक्रिय होता है। सर्वेक्षण शुरू होते हैं, यह देखा जाता है कि किन गलियों में फायर ब्रिगेड पहुँच सकती है और कहाँ रास्ते चौड़े करने की जरूरत है। संभावित आगजनी वाले क्षेत्रों की सूची बनाई जाती है, लेकिन इन रिपोर्टों का भविष्य अक्सर फाइलों तक ही सीमित रह जाता है।
पिछले वर्ष कुछ अस्पतालों में आग लगने की घटनाओं और मरीजों की मौत के बाद सरकार ने अस्पतालों में फायर सिस्टम अनिवार्य करने के निर्देश दिए थे। इसी तरह स्कूलों, कोचिंग संस्थानों, बड़े शैक्षणिक परिसरों और व्यावसायिक बाजारों में भी अग्नि सुरक्षा उपकरणों को अनिवार्य किया गया। लेकिन इन निर्देशों के क्रियान्वयन की स्थिति बेहद कमजोर है। नगर निगम और संबंधित विभाग नियमित निरीक्षण करने में असफल साबित हो रहे हैं। कई संस्थानों में या तो फायर सिस्टम लगाए ही नहीं गए हैं या वे केवल औपचारिकता भर रह गए हैं।
समस्या केवल उपकरणों की कमी तक सीमित नहीं है। शहरों की योजना और संरचना भी बड़ी चुनौती है। कई पुराने बाजार और आवासीय क्षेत्र इतने घने और अव्यवस्थित हैं कि आपातकालीन सेवाओं का वहाँ पहुँचना मुश्किल हो जाता है। इन क्षेत्रों में न तो पर्याप्त चौड़ी सड़कें हैं और न ही पानी के स्रोतों की उचित व्यवस्था। ऐसी स्थिति में जब आग लगती है, तो आग बुझाने का काम बेहद कठिन हो जाता है।
इसके अलावा फायर ब्रिगेड विभाग की संसाधन क्षमता भी सीमित है। कई शहरों में फायर स्टेशनों की संख्या कम है, आधुनिक उपकरणों का अभाव है और कर्मचारियों की भी कमी बनी रहती है। गर्मियों के मौसम में आग लगने की घटनाएँ बढ़ जाती हैं, लेकिन इसके बावजूद पूर्व तैयारी का अभाव दिखाई देता है। यदि समय रहते उपकरणों की खरीद, कर्मचारियों का प्रशिक्षण और संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान कर ली जाए, तो कई बड़ी घटनाओं को टाला जा सकता है।
जनता की भूमिका भी इस संदर्भ में महत्वपूर्ण है। कई बार भवन निर्माण के दौरान सुरक्षा मानकों की अनदेखी की जाती है। बाजारों में अवैध निर्माण और अतिक्रमण से रास्ते संकरे हो जाते हैं, जिससे आपातकालीन सेवाओं का मार्ग अवरुद्ध हो जाता है। बिजली के तारों की अव्यवस्थित व्यवस्था भी आग लगने का बड़ा कारण बनती है। यदि नागरिक और प्रशासन दोनों मिलकर जिम्मेदारी निभाएँ, तो जोखिम को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि आगजनी की घटनाओं के बाद सक्रिय होने की बजाय पहले से तैयारी की जाए। नगर निगम, फायर विभाग और सरकार को मिलकर एक व्यापक रणनीति तैयार करनी होगी। संवेदनशील क्षेत्रों का स्थायी सर्वे, नियमित निरीक्षण, आधुनिक उपकरणों की उपलब्धता और सख्त नियमों का पालन सुनिश्चित करना जरूरी है। साथ ही जनजागरूकता अभियान चलाकर लोगों को भी आग से बचाव के उपायों के प्रति जागरूक करना होगा।
यदि अब भी प्रशासन ने अपनी कार्यप्रणाली नहीं बदली, तो “प्यास लगने पर कुआँ खोदने” की यह परंपरा आगे भी जारी रहेगी और हर साल आगजनी की घटनाओं में जान-माल की क्षति होती रहेगी। समय की मांग है कि प्रतिक्रियात्मक नहीं, बल्कि सक्रिय और दूरदर्शी नीति अपनाई जाए, ताकि प्रदेश के शहर सुरक्षित बन सकें और भविष्य में ऐसी त्रासदियों को रोका जा सके।